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ताना बाना

राहत संगठनों पर माओवादियों की मदद का आरोप

छत्तीसगढ़ पुलिस ने दो बड़ी अंतरराष्ट्रीय राहत एजेंसियों पर माओवादियों की मदद का आरोप लगाया है. सरकार का इशारा डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स और रेड क्रॉस की तरफ है. दोनों ही संगठनों ने इन आरोपों को खारिज किया है.

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छत्तीसगढ़ में सबसे अशांत जिले दंतेवाड़ा के पुलिस प्रमुख का दावा है कि दो अंतरराष्ट्रीय संगठनों के डॉक्टर गरीबों की मदद करने के नाम पर माओवादियों का इलाज कर रहे हैं. पुलिस का यह बयान हाल ही में एक फार्मेसी में दो माओवादियों की गिरफ्तारी के बाद सामने आया है.

Deutschland Haiti Hilfe Lager in Berlin

बताया जाता है इन माओवादियों के पास से छह हजार डॉलर की दवाएं मिली और उन्होंने बताया है कि डॉक्टर्स विद आउट बॉर्डर्स (एमएसएफ) और रेड क्रॉस के लोग उनका इलाज कर रहे हैं.

आरोपों से इनकार

वहीं रेडक्रॉस के प्रवक्ता एलेक्सिस हीब ने राज्य पुलिस के इन आरोपों को गलत बताया है. वह कहते हैं, "हम दंतेवाड़ा के एसपी के बयान पर हैरान हैं. यह बयान ऐसे समय में आया है जब रेडक्रॉस दंतेवाड़ा में कोई कार्यक्रम भी नहीं चला रहा है. रेडक्रॉस अभी सिर्फ बीजापुर जिले कुतरु गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में काम कर रहा है और अधिकारियों को इस बात की पूरी जानकारी है."

छत्तीसगढ़ भारत में माओवादी हिंसा का सबसे बड़ा गढ़ कहा जाता है. हाल ही में रेडक्रॉस ने राज्य में एंबुलेंस और प्राथमिक उपचार की सुविधाओं के साथ चिकित्सा सुविधाओं को बेहतर बनाने में योगदान देना शुरू किया है.

Indische Paramilitärs gegen Maoistische Rebellen

एमएसएफ के भारत प्रमुख मार्टिन स्लूट भी राज्य पुलिस के आरोपों से हैरान हैं. इस वक्त छत्तीसगढ़ में मौजूद स्लूट कहते हैं, "एमएसएफ का इस इलाके में या दुनिया के किसी भी हिस्से में चल रहे संघर्ष के राजनीतिक संदर्भ से कोई लेना देना नहीं है. हम तो सिर्फ जरूरतमंद लोगों तक चिकित्सा सुविधाएं पहुंचाने के लिए काम कर रहे हैं.

इनमें वे सभी आम लोग शामिल हैं जिनके हाथ में बंदूक नहीं है. दूसरा हमारा सिद्धांत है भेदभाव न करना. हम लिंग, राजनीतिक विचारधारा, रंग, धर्म या किसी और आधार पर लोगों में फर्क नहीं करते हैं. हम डॉक्टर हैं हमारा काम बीमार लोगों का इलाज करना है."

बहुत मुश्किल है काम

माओवादियों और सलवा जुड़ुम के बीच संघर्ष के बाद अंतरराष्ट्रीय संगठन पहली बार 2006 में छत्तीसगढ़ में आए. लगभग एक साल पहले छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार और पश्चिम बंगाल के माओवादियों के प्रभाव वाले इलाकों में उनके सफाए के लिए एक बड़ा अभियान छेड़ा गया.

इस अभियान में विशेष तौर पर प्रशिक्षित लगभग अर्धसैनिक बलों के 20 हजार जवानों ने हिस्सा लिया. इस वक्त कुल मिला कर 50 हजार पुलिसकर्मियों को माओवादियों से निपटने के लिए तैनात किया गया है.

एलेक्सिस हीब कहते हैं, "हमारा काम हमेशा मुश्किल और विवादास्पद रहा है, खास कर जब हम ऐसे इलाके में होते हैं जहां हिंसा और अस्थिरता होती है. लेकिन हम तो लोगों को मानवीय सहायता देने का काम कर रहे हैं." डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स और रेड क्रॉस संकटग्रस्त क्षेत्रों में फंसे लोगों को मानवीय सहायता देने के लिए नोबेल शांति पुरस्कार पा चुके हैं.

रिपोर्टः मुरली कृष्णन, नई दिल्ली

संपादनः ए कुमार

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