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दुनिया

राष्ट्रीय भाषाओं को बढ़ावा या हिंदुत्ववादी एजेंडा

भारत में 500 से ज्यादा केंद्रीय विद्यालयों में तीसरी भाषा के तौर पर पढ़ाई जा रही जर्मन भाषा की पढ़ाई बंद कर, संस्कृत पढ़ाने का जो फरमान जारी किया गया है, उसमें भाजपा के हिंदुत्ववादी एजेंडे की झलक देखने को मिल रही है.

भाषाविदों का कहना है कि इस फैसले के पीछे राष्ट्रीय भाषाओं को बढ़ावा देने की जो दलील दी गई है, वह दरअसल एक दिखावा है. असली मुद्दा भाजपा के एजेंडे के तहत स्वदेशी को थोपना है. कुछ पर्यवेक्षक इस कदम को पिछली सरकार के तमाम फैसलों को बदलने की कवायद के तौर पर भी देख रहे हैं.

जी-20 में जर्मन चांसलर अंगेला मैर्केल की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष यह मुद्दा उठाए जाने के बाद मानव संसाधन मंत्रालय इस विवाद में बलि का बकरा तलाश रहा है. वह अब इस बात की जांच कर रहा है कि आखिर जल्दबाजी में जर्मन भाषा की पढ़ाई सत्र के बीच में ही रोकने का फैसला क्यों और किसने किया?

दूसरी ओर, स्मृति ईरानी ने भी अब अपने फैसले के बचाव की कवायद शुरू कर दी है. उनकी दलील है कि जर्मन भाषा की पढ़ाई राष्ट्र के ‘तीन भाषा' फार्मूले का उल्लंघन करती है. ईरानी ने कहा है कि छात्र अतिरिक्त विषय के तौर पर इस भाषा की पढ़ाई कर सकते हैं. उनका कहना है कि वर्ष 2011 में हुए इस सहमति पत्र की भी जांच शुरू कर दी गई है. सरकार ने पिछले महीने अदालत में एक हलफनामे के जरिए बताया था कि इस सहमति पत्र को मानव संसाधन मंत्रालय की मंजूरी नहीं मिली थी. अब इस मामले में जर्मनी के एतराज पर मंत्रालय को सूचित कर दिया गया है. इसके बाद मामले की नए सिरे से समीक्षा हो रही है. कुछ विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि मौजूदा सत्र के बीच से ही इसे शुरू करने के बजाय छात्रों को इसके लिए कुछ और समय दिया जाना चाहिए.

तीन साल पहले हुए करार की जानकारी नहीं होने का दावा करने वाले मंत्रालय को अब भी इस भाषा विवाद से संबंधित दो मुद्दों के जवाब की तलाश है. पहला तो यह कि चालू सत्र के बीच में इस फैसले को लागू करने से छात्रों का भारी दिक्कत होगी. इसके बचाव में कहा जा रहा है कि छात्रों को तीसरी भाषा चुनने का विकल्प दिया जाएगा. इसके अलावा सरकार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस फैसले से कहीं जर्मन भाषा के प्रति किसी भेदभाव या दुर्भावना का संदेश तो नहीं जाएगा.

मौजूदा दौर में किसी न किसी विदेशी भाषा का ज्ञान जरूरी है. इसलिए केंद्रीय विद्यालयों के करीब 68 हजार छात्रों ने तीसरी भाषा के तौर पर जर्मन का विकल्प चुना था. लेकिन अब उनकी पढ़ाई भी अधूरी रह जाएगी. वैसे, देश के कई संगठनों ने इस फैसले को लागू करने के तरीके की आलोचना करते हुए फैसले का स्वागत किया है. उनकी दलील है कि संस्कृत इस देश की विरासत है और उसे सहेजने में कोई बुराई नहीं है. लेकिन कई संगठन इसका विरोध भी कर रहे हैं. तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी पीएमके के नेता एस.रामदास ने इस फैसले के खिलाफ आंदोलन का एलान किया है.

सरकार के इस फैसले से तमाम अभिभावक भी परेशान हैं. तीन महीने बाद ही छात्रों की वार्षिक परीक्षाएं होनी हैं. इसके अलावा सबसे ज्यादा दिक्कत उनको है जो बोर्ड की परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं. यह सही है कि पहले इस फैसले को बिना किसी योजना के आनन-फानन में लागू किया गया. लेकिन अब इसकी पढ़ाई खत्म करने का फैसला भी उतनी ही जल्दबाजी में किया गया है.

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