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राजनीति में महिलाओं की नहीं बदलती स्थिति

राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जा सकी है. "द नैशनल एलायंस फॉर द वूमेन रिजर्वेशन बिल" के शोध मुताबिक पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में महज 6 फीसदी महिला उम्मीदवारों को ही मौका दिया गया है.

राज्य विधानसभा चुनावों में महिला उम्मीदवारों की दयनीय स्थिति दो दशकों से लंबित महिला आरक्षण विधेयक की कहानी बयां करता है. महिलाओं की उम्मीदवारी को मजबूत आधार देने वाला यह विधेयक अब तक देश में कोई भी सरकार पारित नहीं करवा सकी है. विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी संसद के दोनों सदनों में महज 12 फीसदी है.

साल 2010 में संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीट आरक्षित करने वाला यह विधेयक उच्च सदन द्वारा पारित किया गया था. लेकिन विधि निर्माण क्षेत्र में पुरुषों के दबदबे के चलते इस विधेयक को निचले सदन में चर्चा के लिए पेश नहीं किया जा सका.

20 महिला अधिकार संगठनों के गठबंधन, "द नैशनल अलायंस फॉर द वुमन रिजर्वेशन बिल" के शोध मुताबिक जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं वहां महज 6 फीसदी महिला उम्मीदवार हैं.

सेंटर फॉर सोशल रिसर्च की निदेशक रंजना कुमारी के मुताबिक "जिस तरह की परेशानी महिलाओं को आम जीवन में झेलनी पड़ती है ठीक वैसा ही राजनीतिक दलों में होता है. पुरुषों के दबदबे वाले इन राजनीतिक दलों के दफ्तरों में साफ नजर आता है कि महिलाओं के लिए स्थिति सहज नहीं है."

रंजना के मुताबिक महिलाएं कभी खुलकर अपनी परेशानी का जिक्र नही करतीं लेकिन इन्हें यौन शोषण से लेकर भेदभाव तक सब झेलना पड़ता है. नतीजतन महिलाओं को राजनीतिक नीति निर्माण में वो जगह अब तक नहीं मिल सकी है जो उन्हें मिलनी चाहिए. इस गठबंधन के मुताबिक पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर में राजनीतिक दलों द्वारा बहुत कम महिला उम्मीदवारों की जगह दी गई है.

उत्तरप्रदेश में भाजपा ने महज 11 फीसदी सीटों पर ही महिला उम्मीदवारों को मौका दिया है. वहीं अन्य दल मसलन कांग्रेस ने 5, समाजवादी पार्टी ने 12 और बहुजन समाज पार्टी ने भी 5 फीसदी सीटें महिला प्रत्याक्षियों के खाते में डाली हैं. विश्व आर्थिक मंच द्वारा सालाना जारी की जाने वाली ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट के मुताबिक 144 देशों की सूची में भारत का 87वां स्थान है. इसमें महिलाओं की आर्थिक भागीदारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी का आकलन किया जाता है. 

विशेषज्ञों के मुताबिक देश में यौन हिंसा, महिला स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे मसलों से निपटने की जरूरत है तभी महिलाओं की बेहतर स्थिति को सुनिश्चित किया जा सकेगा. जॉइंट वुमन प्रोग्राम की निदेशक ज्योत्सना चटर्जी का मानना है कि संसदीय प्रक्रिया में महिलाओं की हिस्सेदारी का कम होना महज महिलाओं से जुड़ा हुआ मसला नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक मुद्दा है क्योंकि भारतीय संविधान महिलाओं और पुरुषों को एक समान अधिकार देता है. उन्होंने कहा की इस सरकार ने और साथ ही विपक्षी दल कांग्रेस ने भी अपने घोषणापत्रों में इस मुद्दे का जिक्र किया था और अब उन्हें अपने वादे पर कायम रहते हुए इस दिशा में काम करना चाहिए. 

आईपीयू के मुताबिक भारतीय संसद में महिलाओं की भागीदारी इसके पड़ोसी देशों से भी कम है. पाकिस्तान में महिलाओं की भागीदारी तकरीबन 21 फीसदी है तो अफगानिस्तान में 28 फीसदी, नेपाल में 30 फीसदी और बांग्लादेश में 20 फीसदी है.

एए/वीके (रॉयटर्स)

 

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