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मनोरंजन

राजनीति कला को मार देती है: गुलाम अली

पाकिस्तान के जाने-माने गजल गायक गुलाम अली ने कहा है कि कलाकारों को राजनीति से दूर रहना चाहिए. कोलकाता पहुंचे गुलाम अली ने डीडब्ल्यू से बातचीत में और क्या कहा, जानें.

गुलाम अली का कहना है कि पड़ोसी देशों में अमन की उम्मीद को जीवित रखना कलाकारों की जिम्मेदारी है. राजनीति करने वाले कभी महान कलाकार नहीं हो सकते. वह मानते हैं कि पड़ोसी देशों में बेहतर रिश्तों में कलाकारों की भूमिका अहम है. बीते साल अक्तूबर में शिवसेना की धमकियों के चलते मुंबई में उनका कार्यक्रम रद्द हो गया था. उसके बाद इस कलाकार ने भारत की धरती पर कदम नहीं रखने की कसम खाई थी. लेकिन बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के न्योते पर उन्होंने कोलकाता में अपने बेहतरीन गायन से श्रोताओं का मन मोह लिया. गजल सम्राट ने डीडब्ल्यू के सवालों के जवाब इस अंदाज में दिए.

भारत और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों में कलाकारों की क्या भूमिका हो सकती है?

कलाकार इस रिश्ते को प्रगाढ़ करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. लेकिन कलाकारों को राजनीति से दूर रहना चाहिए. राजनीति उनकी कला को मार देती है.

आपने भारत नहीं आने की कसम खाई थी. लेकिन फिर यहां कैसे आए?

यह सही है कि मुंबई में कार्यक्रम रद्द होने से मैं काफी दुखी था. मेरी उदासी का सफर उसी दिन से शुरू हो गया था. लेकिन कोलकाता के श्रोताओं का प्यार मुझे खींच लाया. फिर मैं ममता बनर्जी का न्योता टाल नहीं सका. आज मेरी उदासी खत्म हो गई है. मैं कोलकाता यूं तो पिछले 35 वर्षों से आ रहा हूं, लेकिन इस बार लगता है कि पचास वर्षों के अंतराल पर यहां आया हूं. यहां अपना कार्यक्रम पेश कर बेहद खुश हूं.

आपकी पसंदीदा गजल कौन सी है?

तमाम गजलें मेरे लिए अपनी संतान की तरह हैं. उनमें से किसी एक को चुनना मुश्किल है. लेकिन लोग जब किसी गजल को पसंद करने लगते हैं तो वह मेरी पसंदीदा बन जाती है.

आप फिल्मों के लिए कम गाते हैं. इसकी कोई खास वजह?

देखिए, यहां मैं एक बात साफ कर दूं कि फिल्मों में गाना कभी मेरी प्राथमिकता नहीं रही. फिल्म वाले मुझसे अपनी जरूरत के मुताबिक गाने को कहते हैं. मैंने भारतीय के अलावा पाकिस्तानी फिल्मों में भी गाया है. लेकिन जब मेरे पास समय होता है तभी फिल्मों के लिए गाता हूं.

भारतीय फिल्म संगीत में पहले के मुकाबले अब क्या कोई फर्क महसूस करते हैं?

अब फिल्मों में संगीत का स्वरूप पहले के मुकाबले बदल गया है. पहले नौशाद व मदन मोहन जैसे संगीत निर्देशक थे. उनके अलावा सलिल चौधरी और मन्ना डे के साथ भी मेरी काफी बनती थी. लेकिन अब तेज संगीत और जींस का जमाना है. लेकिन मैंने आज तक कभी जींस नहीं पहनी है.

बीआर चोपड़ा की फिल्म निकाह में आपकी मशहूर गजल चुपके-चुपके रात दिन. कैसे इस्तेमाल हुई थी?

इस गजल को मैंने लाहौर में रोडियो पाकिस्तान के लिए गाया था. तब पता नहीं था कि यह इतनी मशहूर हो जाएगी. बाद में एचएमवी ने उसका रिकार्ड तैयार किया. उसके बाद ही चोपड़ा व सलमा आगा ने मुझे फोन किया. वे चाहते थे कि मैं भारत आकर उनकी फिल्म के लिए एक गाना रिकार्ड करूं. लेकिन उस समय भारत आने के लिए एनओसी की जरूरत पड़ती थी. इसके अलावा मैं तब अमेरिका के दौरे पर था. इसलिए मैंने चोपड़ा जी से कहा कि वह उनके रिकार्ड से उस गजल का इस्तेमाल कर लें. मैं बाद में आकर फिल्म के लिए इसे रिकार्ड कर दूंगा.

कोलकाता में दर्शकों का रवैया कैसा रहा?

कोलकाता के लोगों में संगीत की खासी समझ है. यहां कार्यक्रम पेश करना मुझे शुरू से ही अच्छा लगता है. यही वजह है कि इस बार मैं अपने बेटे आमिक को भी साथ लाया कि वह कोलकाता के श्रोताओं और दर्शकों का प्यार और संगीत के प्रति उनके लगाव को महसूस कर सके.

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