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ब्लॉग

राजनीतिक विरोधियों पर मानहानि मुकदमा अनुचित

राजनीतिज्ञ भी अब निजी होने लगे हैं. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने निजी हैसियत में दिल्ली के मुख्यमंत्री पर मानहानि का मुकदमा किया है. कुलदीप कुमार राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ मानहानि के मुकदमे को अनुचित मानते हैं.

अजीब नजारा है. भारत का वित्तमंत्री दिल्ली के मुख्यमंत्री और उसकी पार्टी के चार अन्य नेताओं के खिलाफ दीवानी और फौजदारी के मुकदमे ठोंक रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री ने उस क्रिकेट एसोसिएशन के खिलाफ जांच आयोग गठित कर दिया है जिसका वह चौदह साल तक अध्यक्ष था. लेकिन वित्तमंत्री अपनी ही पार्टी के उस सांसद के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहा जिसने रविवार को बाकायदा संवाददाता सम्मेलन करके उसी एसोसिएशन के खिलाफ वही आरोप लगाए हैं जिनकी जांच के लिए आयोग गठित किया गया है. ऊपर से तुर्रा यह कि वह सांसद आज ट्वीट करके वित्तमंत्री पर व्यंग्य भी कर रहा है और पूछ रहा है कि उसे क्यों छोड़ दिया गया? उस पर मुकदमा क्यों नहीं चलाया जा रहा?

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने आज दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी के चार नेताओं के खिलाफ दीवानी और फौजदारी के मुकदमे दायर कर दिये हैं क्योंकि उन्होंने दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट एसोसिएशन (डीडीसीए) की जांच के लिए प्रसिद्ध विधिवेत्ता गोपाल सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में एक आयोग गठित कर दिया है और जेटली के कार्यकाल के दौरान भारी भ्रष्टाचार होने के गंभीर आरोप लगाए हैं. जेटली वर्ष 2013 तक इस संस्था के अध्यक्ष थे. लेकिन उनकी भारतीय जनता पार्टी के सांसद और भूतपूर्व टेस्ट क्रिकेटर कीर्ति आजाद बरसों से उनके खिलाफ यही आरोप लगाए जा रहे हैं. रविवार को तो उन्होंने एक संवाददाता सम्मेलन करके एक वीडियो भी दिखाया जिसमें सिद्ध किया गया था कि डीडीसीए ने जिन 14 कंपनियों को करोड़ों रुपयों का भुगतान किया उनका अस्तित्व ही संदिग्ध है क्योंकि रिकॉर्ड में उनके जो पते हैं, उन पतों पर वे नहीं पायी जातीं. इस तरह के तथ्य भी सामने आए हैं कि एक लैपटॉप कंप्यूटर के लिए प्रतिदिन 16 हजार रुपये के किराये का भुगतान किया गया और एक प्रिंटर के लिए प्रतिदिन तीन हजार रुपये किराये के रूप में दिये गए. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कीर्ति आजाद ही नहीं, बिशन सिंह बेदी जैसे बुजुर्ग क्रिकेटर ने भी अरुण जेटली को डीडीसीए में हुए भ्रष्टाचार का सरपरस्त बताया है.

भारत के क्रिकेट प्रतिष्ठान में भारी भ्रष्टाचार व्याप्त है, इस बारे में किसी को भी कोई शंका नहीं है. पिछले दो-तीन दशकों के दौरान क्रिकेट के खेल में बहुत अधिक पैसा आ गया है. खिलाड़ी जहां पहले हजारों में कमाते थे, अब वे आनन-फानन में करोड़पति और कुछ सालों में ही अरबपति हो जाते हैं. इसलिए देश भर की क्रिकेट एसोसिएशनों पर ऐसे-ऐसे राजनीतिक नेताओं ने कब्जा कर लिया है जिन्हें क्रिकेट और टेनिस की गेंद में फर्क नहीं मालूम. इस मामले में सभी पार्टियों के नेताओं के बीच गजब का भाईचारा है. क्रिकेट में शरद पवार हों या लालू यादव, फारूक अब्दुल्ला हों या अरुण जेटली, राजीव शुक्ल हों या अमित शाह या फिर नरेंद्र मोदी, सभी के बीच एकता है. क्रिकेट में भ्रष्टाचार और उसे मिले राजनीतिक संरक्षण का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश से भागे हुए ललित मोदी कुछ ही दिन पहले फिर से राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष चुन लिए गए हैं.

मानहानि का मुकदमा शायद ही कभी अपनी तार्किक परिणति तक पहुंचता हो. अक्सर इसका इस्तेमाल विरोधियों को परेशान करने के लिए किया जाता है ताकि वह अदालत के चक्कर काटता रहे. अन्य बहुत से कानूनों की तरह ही मानहानि का कानून भी अंग्रेजों के औपनिवेशिक शासन की विरासत है जिसे स्वाधीन भारत ढोये जा रहा है. इस संदर्भ में सवाल यह है कि क्या राजनीतिक नेताओं को अपने बचाव में इसका इस्तेमाल करना चाहिए? जब भाजपा समेत अनेक पार्टियों के नेताओं ने 1980 के दशक के उत्तरार्ध में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स तोप के सौदे में रिश्वत लेने के आरोप लगाए थे, तब तो उन्होंने उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा नहीं किया था. न ही पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया जिन पर कोयले की खानों के आवंटन में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए थे. यदि दिल्ली की सरकार ने डीडीसीए की जांच के लिए आयोग का गठन किया है तो जेटली समेत उसके सभी पूर्व और वर्तमान पदाधिकारियों का कर्तव्य है कि वे उस जांच में सहयोग करें और अपने निर्दोष होने को साबित करें. राजनीतिक विरोधियों पर मानहानि के मुकदमे ठोंकना प्रसिद्ध वकील अरुण जेटली को तो शोभा दे सकता है, भारत के वित्तमंत्री अरुण जेटली को नहीं.

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