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दुनिया

राजनीतिक दलों के लिए आफत

पांच सौ और एक हजार रुपए के नोटों पर पाबंदी लगाने के केंद्र सरकार के फैसले से राजनीतिक दलों के सिर पर समस्याओं का पहाड़ टूट पड़ा है.

अगले साल ही उत्तर प्रदेश के अलावा उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं. यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि चुनाव आयोग की ओर से खर्च की सीमा तय होने के बावजूद तमाम उम्मीदवार इन चुनावों के दौरान हजारों करोड़ रुपए खर्च करते हैं. इसके लिए वह पहले से ही नकद चंदे के तौर पर यह रकम जुटा रहे थे. अब उनके सामने भारी समस्या पैदा हो गई है.

बढ़ता चुनावी खर्च

भारत में साल दर साल चुनावी खर्च सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता ही जा रहा है. तमाम उम्मीदवार इसके लिए छह महीने पहले से ही नकदी जुटाने में जुट जाते हैं. जाहिर है यह रकम पांच सौ और हजार के नोटों की शक्ल में ही होती है. लेकिन सरकार की ओर से हुई इस ताजा सर्जिकल स्ट्राइक ने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को भारी झटका दिया है. उनके लिए इस सदमे से उबरना आसान नहीं होगा. उनके सामने दिक्कत यह है कि इस तरह जुटाई गई ज्यादातर रकम बेहिसाबी होती है. पहले से उसे घोषित नहीं करने की वजह से अब उनके सामने इन नोटों से निजात पाना एक बड़ी समसया है. वह न तो कानूनन तौर पर इन रुपयों को बदल सकते हैं और न ही इसे खर्च कर सकते हैं.

खासकर उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनावों में भारी पैमाने पर रकम खर्च की जाती है. वहां यह मनी पावर चुनावी रणनीति व प्रबंधन का अहम हिस्सा है. अब सरकार के ताजा फैसले के बाद तमाम राजनीतिक दल और उम्मीदवार नई रणनीति बनाने और चुनावी खर्च में भारी कटौती की योजना बनाने में जुट गए हैं. बड़े नोटों पर पाबंदी लगाने का यह फैसला हालांकि बीजेपी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने ही लिया है. लेकिन इस पार्टी और उसके नेताओं को भी इस फैसले से डंक लगा है. उत्तर प्रदेश और पंजाब में सत्ता में आने का सपना देख रही पार्टी की उम्मीदें कुछ हद तक तो धूमिल हो ही गई हैं.

विशेषज्ञों में प्रसन्नता

देश के पूर्व चुनाव आयुक्तों ने सरकार के इस फैसले की सराहना की है. एक पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंग्डोह कहते हैं कि तमाम राजनीतिक दलों ने अपने चुनाव अभियान के लिए बड़े पैमाने पर काला धन जुटा रखा था. सरकार का यह फैसला उस काले धन पर करारा हमला है. लिंग्डोह कहते हैं, "यह चुनाव के पहले किसी भारी आपदा से कम नहीं है. तमाम दलों के पास रखी यह रकम अब बेकार हो चुकी है. ताजा फैसले के बाद अब उनको नए सिरे से अपनी चुनावी रणनीति तय करनी होगी."

एक अन्य पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एचएस ब्रह्म कहते हैं कि भारत में चुनावों में धनबल का प्रचलन हाल के वर्षों में काफी बढ़ा है. अब मोदी सरकार के फैसले से कम से कम इस मामले में तमाम उम्मीदवारों को बराबरी का मौका मिलेगा. अब खासकर अपने समर्थकों व कार्यकर्ताओं से चंदे के तौर पर चुनावी खर्च बटोरने वाली पार्टियों और उम्मीदवारों के लिए संकट काफी बढ़ गया है.

नकदी का बोलबाला

भारतीय चुनावों में नकदी का भारी बोलबाला रहा है. वर्ष 2004, 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान तमाम प्रमुख राजनीतिक दलों ने चुनावी खर्च के लिए 1299.53 करोड़ रुपए चेक के जरिए जुटाया था और 1,039 करोड़ नकदी के तौर पर. कांग्रेस ने वर्ष 2004 से 2014 के बीच होने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए जो 2,259 करोड़ की रकम जुटाई थी उसका 68 फीसदी हिस्सा नकद के रूप में था. इस दौरान भाजपा ने करीब 2000 करोड़ जुटाए और इसका 44 फीसदी हिस्सा नकद के तौर पर था. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2004 से 2015 के दौरान हुए 71 विधानसभा चुनावों के लिए राजनीतिक दलों ने कुल चंदे में से 63 फीसदी (2,108 करोड़) नकदी के रूप में लेना स्वीकार किया था और महज 37 फीसदी यानी 1,245 करोड़ चेक के रूप में. इसी से चुनावों में काले धन की बढ़ती अहमियत का पता चलता है.

चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों के मुताबिक राजनीतिक दलों के लिए नकदी के तौर पर मिले दान और चंदे का खुलासा करना अनिवार्य है. लेकिन देश में होने वाले चुनावों के दौरान जब्त होने वाली नकदी का आंकड़ा कुछ और ही कहता है. मिसाल के तौर पर बीते लोकसभा चुनावों के दौरान आयोग ने 330 करोड़ की नकदी जब्त की थी. उससे साफ है कि चुनाव में कालेधन का खुल कर इस्तेमाल होता है. इस मामले में कोई भी राजनीतिक दल पाक-साफ नहीं है.

राजीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि खासकर क्षेत्रीय दलों पर इस पाबंदी का सबसे ज्यादा प्रभाव होगा. इसकी वजह यह है कि उनके पास भारी नकदी के प्रबंधन के लिए न तो जरूरी संसाधन हैं और न ही रणनीतिकार. एक पर्यवेक्षक का कहना है कि जब तक राजनीतिक दलों पर नकदी के रूप में चंदा जुटाने पर पाबंदी नहीं लगती तब तक काले धन पर पूरी तरह अंकुश लगाना संभव नहीं है.

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