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मंथन

रफ्तार की होड़ में मौत को दावत

भारत में तेज ड्राइविंग के चलते सड़क हादसों में रोजाना 166 लोगों की मौत हो जाती है. वाहनों की गति सीमा पर निगरानी का कोई ठोस तंत्र अब तक विकसित नहीं हुआ है. सड़क हादसों से देश को सालाना 550 अरब रुपये का नुकसान होता है.

भारतीय सड़कों पर होने वाले हादसों में मरने वालों की तादाद हर साल बढ़ती ही जा रही है. केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय की शोध शाखा की ओर से तैयार ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि शराब पीकर वाहन चलाने के मामलों में होने वाली मौतें इससे अलग हैं. वर्ष 2012 के दौरान देश में ऐसे हादसों में 68 हजार लोग मारे गए. इनमें से 60,700 मौतें अंधाधुंध ड्राइविंग की वजह से हुए हादसों के कारण हुई. यह रिपोर्ट देश भर में सड़क हादसों की पुलिस में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर तैयार की गई है. कई मामलों की शिकायत पुलिस तक नहीं पहुंच पाती. इसलिए इस आंकड़े के और ज्यादा होने का अंदेशा है. सबसे चिंता की बात यह है कि इन हादसों में लाखों लोग घायल हो जाते हैं. इनमें से कई लोग शारीरिक तौर पर अपंग हो जाते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक 2012 में सड़क हादसों में 2.38 लाख लोग घायल हुए थे. सरकार के पास इसका कोई आंकड़ा नहीं है कि ऐसे हादसों में गंभीर रूप से घायल कितने लोगों ने बाद में दम तोड़ दिया.

महाराष्ट्र पहले स्थान पर

सड़क हादसों में होने वाली मौतों के मामले में महाराष्ट्र पहले नंबर पर है. वहां एक साल के दौरान 8,600 लोग मारे गए. उसके बाद क्रमशः तमिलनाडु, राजस्थान, कर्नाटक और गुजरात का नंबर है. शराब पीकर वाहन चलाना, हेलमेट नहीं पहनना और सीट बेल्ट नहीं बांधना ही पूरी दुनिया में साल दर साल बढ़ते सड़क हादसों की तीन प्रमुख वजहें हैं. ऐसे हादसे ज्यादातर नेशनल और स्टेट हाइवे पर होते हैं. इसकी वजह यह है कि शहरों में तो वाहनों की गति पर ट्रैफिक पुलिस की निगाह रहती है. लेकिन देश में हाइवे पर उनकी गति सीमा को नियंत्रित करने का न तो कोई तंत्र है और न ही ऐसा करने वालों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई का कोई प्रावधान है. सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ और इंस्टीट्यूट फॉर रोड ट्रैफिक एजुकेशन के अध्यक्ष रोहित बालूजा कहते हैं, "देश के कई बड़े राज्यों ने तो अब तक वाहनों के लिए अधिकतम गति सीमा ही नहीं तय की है. ऐसे में उसे लागू करने का सवाल ही कहां पैदा होता है?" वह कहते हैं कि हाइवे पर लोग खतरनाक गति से वाहन चलाते हैं. शराब के नशे में तेज गति से वाहन चलाना अक्सर मौत को दावत देने के समान है.

Indien Verkehr

शहरों में ट्रैफिक का बुरा हाल

कानून आयोग की सिफारिश

न्यायमूर्ति ए.आर.लक्ष्मणन की अध्यक्षता वाले कानून आयोग ने वर्ष 2009 में केंद्रीय कानून मंत्रालय को सौंपी अपनी रिपोर्ट में ऐसे हादसों पर अंकुश लगाने के कुछ उपाय सुझाए थे. लेकिन वह रिपोर्ट ठंढे बस्ते में है. आयोग ने कहा था कि खतरनाक या लापरवाह तरीके से ड्राइविंग, ट्रैफिक नियमों की अनदेखी, बिना ड्राइविंग लाइसेंस के वाहन चलाना, किशोरों के हाथों ड्राइविंग, ड्राइविंग के दौरान सेलफोन पर बातें करना, वाहनों की दशा और सड़कों की बदहाली जैसे कई प्रमुख वजहें इन हादसों के लिए जिम्मेदार हैं. आयोग ने भारतीय दंड संहिता की धारा 304 ए में संशोधन करते हुए लापरवाह तरीके से ड्राइविंग के दोषी अभियुक्तों की सजा मौजूदा दो से बढ़ा कर दस साल करने की सिफारिश की थी. रिपोर्ट में कई अन्य सुझाव भी दिए गए थे. लेकिन उनमें से किसी पर अमल नहीं हो सका.

सड़क सुरक्षा विशेषज्ञ डा. इंद्रजीत जाना कहते हैं, "अगर गति सीमा को कड़ाई से लागू किया जाए तो सड़क हादसे अपने आप आधे हो जाएंगे. गति सीमा का उल्ल्घंन करने वालों पर भारी जुर्माने का प्रावधान होने पर लोग ऐसा करने से बचेंगे." एक अन्य विशेषज्ञ देवेन दास कहते हैं कि देश में दो पहिया या चार पहिया वाहन चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस की न्यूनतम आयु सीमा 21 साल कर देनी चाहिए. वह कहते हैं, "देश के विभिन्न राज्यों में पुलिस को सीसीटीवी कैमरों की सहायता से कुछ खास इलाकों में गति सीमा का उल्लंघन करने वालों पर नजर रखने के लिए पायलट प्रोजेक्ट शुरू करना चाहिए. लोगों में जब तक पकड़े जाने और सजा भुगतने का डर नहीं पैदा होगा, तब तक रफ्तार की होड़ में लोग अपनी जान से हाथ धोते रहेंगे."

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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