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मनोरंजन

रंगमंच पर भी नक्सली साया

पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में मनोरंजन का पर्याय बना जात्रा (थिएटर) भी अब नक्सली आतंक से अछूता नहीं रहा. असुरक्षित माहौल के कारण दर्शक नहीं जुट पार रहे है और यह लोक कला अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है.

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दुर्गापूजा का सीजन शुरू होते ही राजधानी कोलकाता की विभिन्न थिएटर कंपनियां ग्रामीण इलाकों में घूम कर नाटकों का मंचन करती हैं. इनको देखने के लिए दूर-दराज से लोग जुटते हैं. लेकिन दक्षिण बंगाल के तीन जिलों-बांकुड़ा, पुरुलिया और पश्चिम मेदिनीपुर में नक्सली आतंक और साझा सुरक्षा बलों के नक्सल विरोधी अभियान के चलते इन कंपनियों का वजूद ही खतरे में पड़ गया है.

कहां गए वे दिन

इन कंपनियों का सालाना कारोबार सौ करोड़ रुपये का है. इसमें से आधी कमाई इन तीनों जिलों से होती है. नक्सली आतंक की वजह

Farbenfrohes Plakat mit der Ankündigung eines Jatra

कई फिल्म स्टार भी बनते हैं जात्रा का हिस्सा

कोलकाता में जात्रा कंपनियों के मोहल्ले चितपुर में उदासी पसरी है. अक्तूबर से दिसबंर के बीच जात्रा कंपनियां ग्रामीण इलाकों में घूम-घूम कर नाटकों का मंचन करती हैं. इनमें बीते साल भर के दौरान देश-दुनिया की विभिन्न घटनाओं को दिखाया जाता है. खासकर ग्रामीण इलाकों में जात्रा काफी लोकप्रिय रहा है.

इन तीन जिलों में जात्रा के आयोजन के दौरान नक्सलियों और पुलिस के बीच मुठभेड़ में फंसने का डर है. सुरक्षा के लिहाज से पुलिस भी इस आयोजन की अनुमति देने से कतरा रही है. नतीजतन लगभग पांच सौ जात्रा कंपनियां परेशान हैं. तारा मां ओपेरा के मैनेजर स्वपन कुंडू कहते हैं कि जात्रा उद्योग को पहले भी सेटेलाइट टेलीविजन से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है. लेकिन मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरुलिया जैसे बड़े बाजार बंद होने की वजह से यह उद्योग पंगु हो गया है. इस समस्या की वजह से छोटे बजट वाली कुछ कंपनियों ने तो यह काम ही बंद कर दिया है. कुछ और कंपनियां भारी घाटे से गुजर रही हैं. उनको बीते साल इतनी कमाई नहीं हो सकी कि वे कर्ज चुका सकें. इस साल भी अब तक सबसे कमाई वाले इलाकों में कोई खास बुकिंग नहीं हुई है.

पहले ज्यादातर कंपनियों को महीने में लगभग 25 दिनों की बुकिंग मिलती थी. लेकिन अब इनकी तादाद घट कर 10-12 रह गई है. कुछ कंपनियों ने भीड़ जुटाने के लिए कादर खान और असरानी जैसे बालीवुड कलाकारों को भी शो में शामिल किया है. लेकिन एक कंपनी के मैनेजर विमल राय कहते हैं कि जब शो ही नहीं होंगे, तो लोग कैसे आएंगे?

लाल आतंक का साया

मेदिनीपुर, बांकुड़ा और पुरुलिया के खासकर जंगल से घिरे

Anti Maoist Operation

इलाकों में अक्तूबर से दिसंबर तक आयोजित होने वाली इस जात्रा को देखने के लिए दूर-दराज के गावों से लोग जुटते थे. शो के टिकटों की कीमत 25 से सौ रुपये के बीच होती है. स्थानीय क्लब इन जात्रा कंपनियों को बुक करते हैं. लेकिन बीते साल से हालत बदलने लगे हैं. इस साल तो परिस्थिति बेहद खराब है. नक्सली आतंक और सुरक्षा बल के जवानों की घर-पकड़ की वजह से अब रात को लोग अपने घर तक से नहीं निकलते, शो देखने के लिए दूर के गांव तक जाना तो दूर की बात है.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद और बांग्ला फिल्मों के कलाकार तापस पाल और शताब्दी राय भी इन नाटकों में काम करती हैं. लेकिन वे इस दौरान सुरक्षा का अपना अलग इंतजाम करते हैं. दूसरे कलाकार इसके लिए थिएटर कंपनियों पर निर्भर हैं. कुछ कंपनियां नक्सल प्रभावित इलाकों में शो के समय निजी एजेंसियों से सुरक्षा लेने पर विचार कर रही हैं. लेकिन दर्शकों की सुरक्षा का सवाल अनुत्तरित ही रह जाता है. लालगढ़ बाजार में जात्रा आयोजित करने वाले एक क्लब पाणिमंदिर क्लब के सदस्य नरेन महतो कहते हैं कि जब तक लोग दूर-दराज से शो देखने नहीं आएंगे, तब तक व्यावसायिक तौर पर इनका आयोजन घाटे का सौदा ही साबित होगा.

पुलिस भी लाचार

पुलिस भी ऐसे आयोजन की अनुमति देने से कतरा रही है. बांकुड़ा के एसपी प्रणब कुमार कहते हैं कि अगर दर्शकों में छिप कर नक्सलियों ने हमला कर दिया तो क्या होगा. पुरुलिया के एसपी राजेश यादव भी कहते हैं, "हम दूर-दराज के उन इलाकों में जात्रा की अनुमति देने से बच रहे हैं जहां सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं." गीतांजलि ओपेरा के मैनेजर सूर्य सेन कहते हैं कि उन इलाकों में जात्रा आयोजित करना खतरे से खाली नहीं है. तमाम कलाकार भी डरे रहते हैं. इनके अलावा पहले जितने दर्शक भी नहीं जुटते. उनकी कंपनी को लालगढ़ में जात्रा के मंचन की बुकिंग मिली है. लेकिन पुलिस की ओर से अब तक हरी झंडी नहीं मिली है.

जात्रा कंपनियों का कहना है कि अगर यह समस्या और कुछ दिनों तक जारी रही तो मनोरंजन की इस प्राचीन लोक कला का वजूद ही खत्म हो जाएगा.

रिपोर्टः प्रभाकर, कोलकाता

रिपोर्टः ए कुमार

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