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ब्लॉग

ये खाप नहीं है मेरा देश

बेहिचक हिंसा की जा रही है और हंसते हुए हत्याएं. समाज जितना आधुनिक होता जाता है उतना ही दुष्ट भी बन रहा है. न जाने कितनी प्रकट कितनी अदृश्य आंखें आपको घूरती हैं. आपका पीछा न जाने कितने साए कर रहे हैं.

नाइंसाफियां अजीब शक्लों में हमें, हमारे बच्चों और हमारी स्त्रियों को घेर चुकी हैं. जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास “1984” की घटनाएं और किरदार जैसे सब सामने आ गए हैं. हम ही जैसे इस उपन्यास के भीतर डरते सहमते और खौफजदा भटक रहे हैं. ये भय का भूमंडलीकरण है. जो यूपी और उत्तराखंड के किसी गांव से लेकर हरियाणा और जम्मू कश्मीर के किसी गांव और उड़ीसा के किसी शहर से लेकर महाराष्ट्र के किसी देहात और दक्षिण में कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु की किसी प्रेम बगावत की हिला देने वाली दास्तान तक चला गया है.

मध्ययुगीन बर्बरताएं अपनी भूमंडलीयता में लौट आई हैं. भारत देश के ऐन उस देहात में भी गर्जनापूर्वक हर तरह की ज्यादती होने लगी है जो ग्लोबल गांव का हिस्सा बन गया है, सूचना क्रांति से सराबोर है लेकिन हत्या करने में वहां कोई हिचक नहीं है. हरियाणा के एक गांव में लड़का लड़की बेरहमी से मारे गए. यही तो कहा गया कि हमने मारा उन्हें और ठीक किया क्योंकि सबक मिलना जरूरी था. इसे ऑनर किलिंग कह रहे हैं लेकिन सम्मान शब्द का कैसा मजाक है ये? किस सम्मान के लिए ये दुष्कर्म?

ऑनर किलिंग कहकर एक तरह से आप उन खूनियों का संरक्षण करते हैं, उनकी हरकत को किसी न किसी रूप में जस्टीफाई करते हैं. हरियाणा की घटना से कुछ दिन पहले इन्हीं हत्यारों जैसे कुछ लोगों ने यूपी के मुजफ्फरनगर में बेगुनाहों को कत्ल किया था. वे कभी सम्मान के नाम पर तो कभी बदले के नाम पर अपने ही बेटे बेटी को मार डालते हैं. कभी जुनून और कभी नफरत के नाम पर दूसरे धर्म के लोगों की हत्याएं करते हैं. एक ओर उनके अपने खून होते हैं और दूसरी ओर खून से बढ़कर पड़ोसी और गांववाले होते हैं. वर्चस्व, अहम, अंधविश्वास, बेयकीनी, सम्मान, संदेह और नफरत के शोले उन्हें अपने ही खून का खून करने के लिए उकसाते हैं.

लगता है हत्या कर देना इस देश में बहुत आसान और सहज हो गया है. अपने ही समाज में पसरे इस डर पर नजर नहीं जाती. ये क्या है जो घर के भीतर हो रहा है. आंकड़े ही तो कहते हैं कि आतंकवाद से ज्यादा मौतें कभी ऑनर किलिंग के नाम पर, कभी दंगों के नाम पर, कभी बलात्कार के बाद, कभी लूटपाट के बाद हुई हैं इस देश में. इनके लिए क्या सजा है. खाप या पंचायत या परिवार कहे जा रहे उस गिरोह के लिए क्या सजा है जो एक लड़की को पीट पीट कर मार डालता है और एक लड़के के हाथ पैर उखाड़कर उसका सिर धड़ से अलग कर फेंक देता है.

क्या हम भी उस फंदे की गांठ बांध रहे हैं जो हमारे समाज में कमजोरों, गरीबों, उपेक्षितों और वंचितों पर कसा जा रहा है. खाप के खिलाफ एक भी आंदोलन क्यों नहीं है, सिवाय कुछ छिटपुट आवाजों के, कुछ संवेदनशील पॉलिटिकल एक्टिविस्टों के सिवाय बाकी लोग कहां है? हवा में नफरत और अन्याय का जहर है लेकिन वहीं कहीं प्रेम, न्याय, इंसानियत और करुणा की हवा भी तो बह रही है. उसे कोई अपनी मर्दानगी के बक्से में तो बंद कर नहीं सकता. अपने हिसाब से हवा चलती रहे, ये आखिर कैसे मुमकिन है. बिरादरी, परिवार और खाप के क्रूर कायदों से तंग आकर युवा कोनों खुंजों में मिल रहे हैं और अपना सपना देख रहे हैं. घर परिवार के कानून बाड़े सब तोड़कर. लेकिन ये तय है कि वे कट्टरपन और रूढ़ियों की भट्टी को झोंके रखने से बेहतर भाग निकलना समझते हैं. वे ऐसा समझते हैं और निकलने की कोशिश करते हैं, तो आप उन्हें कब तक जकड़े रह सकते हैं.

अदालतों से पहले सरकारों को अपने समाज के पर्दे उठाकर भीतर झांकना होगा कि वहां कितनी आधुनिकता और कितनी प्रगतिशीलता आई है. कितनी मानवीयता और कितना भरोसा. लेकिन वे देखती हैं, टीवी, फ्रीज, कूलर, एसी, फोन, कार, बंगला, रोशनी, लाइफ स्टाइल. इनसे जीडीपी बनती है. सत्ता की राजनीति घृणित किस्म के पिछड़ेपन और खाप कल्चर को नहीं देखती. वो नहीं देखती कि कैसे कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं. क्योंकि इस अनदेखी से वोट बनते हैं. इंसान कैसे बनता है, ये कौन और कब सोचेगा?

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी, देहरादून

संपादन: महेश झा

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