यूरोप से मिलते हैं चीन को हथियार | दुनिया | DW | 30.04.2014
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दुनिया

यूरोप से मिलते हैं चीन को हथियार

भारत, पाकिस्तान और चीन दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार खरीदने वाले देश हैं. पश्चिमी देश अक्सर इस खरीद की आलोचना तो करते हैं लेकिन उन्हें हथियार बेचने से खुद नहीं रुकते.

चीन को यूरोपीय संघ से कई तरह के हथियार मिलते हैं. चीन की थलसेना, वायुसेना और नौसेना को पिछले पांच साल में नई तकनीक से लैस करने में ईयू का बड़ा योगदान रहा है. नौसेना की अगर बात की जाए तो कई ध्वंसक पोत जर्मन कंपनी एमटीयू के बनाए हुए हैं. 1991 से अब तक चीन ने 11 ध्वंसक पोत बनाए हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से नौ में एमटीयू के डीजल इंजन लगे हुए हैं. साथ ही इनमें लगी गैस टर्बाइन यूक्रेन से मंगाई गई है.

अमेरिका स्थित सेना विशेषज्ञ रॉजर क्लिफ का कहना है कि चीन की 'युआन' पनडुब्बियों में भी ऐसा ही है. उनके अनुसार कम से कम 12 पनडुब्बियां ऐसी हैं जिनमें या तो एमटीयू के इंजन हैं या चीन में बनाई गयी उन्हीं इंजन की नकल. नौसेना की एक वेबसाइट 'नेवल टेक्नोलॉजी' के अनुसार डीजल से चलने वाली 'सॉन्ग' पनडुब्बियों में एमटीयू के पुर्जे शोर को कम करने का काम करते हैं. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिप्री) के अनुसार 2010 के अंत तक इन पनडुब्बियों के लिए एमटीयू के 48 इंजन मंगवाए गए थे.

रोल्स रॉयस के पहिए

जर्मनी और यूक्रेन के अलावा ब्रिटेन की तकनीक भी चीनी नौसेना के काम आ रही है. नौसेना की वेबसाइट पर लगी तस्वीरों पर ध्यान दें तो पता चलेगा कि 'हूबाई' मिसाइल बोट में रोल्स रॉयस के पहिए लगे हुए हैं. इसके अलावा वायुसेना के लड़ाकू विमानों में लगने वाले टर्बोफैन भी ब्रिटेन से आ रहे हैं. सिप्री के आंकड़ों के अनुसार 1998 से 2013 के बीच 250 टर्बोफैन मंगाए जा चुके हैं.

वायुसेना को फ्रांस से फायदा मिल रहा है. फ्रांस की कंपनी एयरबस ने 1992 से 2013 के बीच चीन को 357 हेलीकॉप्टर मुहैया कराए. इसमें सेना के उपयोग के एएस565 पैंथर हेलीकॉप्टर शामिल हैं. कंपनी के पास इन्हें चीन में ही बनाने का लाइसेंस है. सिप्री के ही आंकड़े दिखाते हैं कि 1981 से 2013 के बीच जर्मन कंपनी डॉयत्स ने चीन को बख्तरबंद गाड़ियों में इस्तेमाल के लिए 4,400 इंजनें बेची हैं.

समाचार एजेंसी एएफपी ने जब इन कंपनियों से इस बारे में सफाई चाही तो उन्होंने चुप रहना ही बेहतर समझा. डॉयत्स और रोल्स रॉयस ने अब तक एजेंसी के सवालों का जवाब नहीं दिया है. वहीं एमटीयू के एक प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी जो भी कर रही है "वह पूरी तरह जर्मन निर्यात कानून के अनुरूप है".

आईबी/एमजे (एएफपी)

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