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दुनिया

यूरोप में बढ़ती गरीबी

यूरोप में फिर से गरीबों को खाने पीने का सामान बांटा जा रहा है. आर्थिक संकट की वजह से गरीबी तेजी से बढ़ी है. रेड क्रॉस इस बीच इतनी मदद दे रहा है जितनी दूसरे विश्व युद्ध के बाद कभी नहीं दी गई.

खासकर बुल्गारिया या स्पेन जैसे देशों में हालत ज्यादा खराब है. रेड क्रॉस के प्रवक्ता खोजे खावियार सांचेज एसपिनोजा कहते हैं, "मध्यवर्ग के लोगों को भी, जिनके परिवारों में एक-दो नौकरियां चली गई हैं, अचानक हमारी मदद की जरूरत पड़ रही है." बढ़ती गरीबी के कारण रेड क्रॉस इस बीच यूरोपीय संघ के करीब 20 सदस्य देशों में खाने के सामान बांट रहा है. स्पेन में करीब 30 लाख लोग इस मदद पर निर्भर हैं. उन्हें सिर्फ अनाज ही नहीं दिया जाता बल्कि घर का किराया और बिजली पानी का बिल देने के लिए रियायत भी मिलती है.

आर्थिक संकट का सामाजिक असर अब यूरोपीय आयोग को भी परेशान कर रहा है. आयोग प्रमुख जोसे मानुएल बारोसो इसे यूरोपीय संघ के इस साल की शिखर भेंट का मुद्दा बनाना चाहते हैं. आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार खासकर युवा लोग, आप्रवासी और बच्चे वाले अकेले लोग स्थायी गरीबी के खतरे में हैं. गरीबी पर रिसर्च करने वाले राजनीतिशास्त्री क्रिस्टॉफ बुटरवेगे कहते हैं, "समाज के विभाजन का हर स्तर पर मुकाबला किया जाना चाहिए. और इसकी शुरुआत ऐसे न्यूनतम वेतन के साथ होनी चाहिए जिससे परिवार चलाया जा सके."

Jose Barrosso EU Kommission Straßburg Frankreich

कैसे निपटेंगे बारोसो

बढ़ती सामाजिक खाई

यूरोपीय संघ के अनुसार 2008 में आर्थिक संकट की शुरुआत के बाद से संघ के करीब आधे देशों में गरीबी का जोखिम बढ़ा है. सबसे नाटकीय हालत बुल्गारिया की है जहां 2011 में आधी आबादी गरीबी और सामाजिक अलगाव के खतरे में थी.

रेड क्रॉस की अपील यूरोप के अंदर क्षेत्रीय अंतरों को भी साफ दर्शाती है. जर्मनी में संगठन को कोई मदद नहीं बांटनी पड़ रही है. लेकिन यहां भी टाफेल नाम से शहरों में संस्थायें बन रही हैं जहां गरीबों को खाद्य पदार्थ बांटे जा रहे हैं. जर्मनी के उलट ग्रीस में मेडिको इंटरनेशनल के अनुसार बहुत से लोगों के पास हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है. जर्मन रेड क्रॉस के फ्रेडरिक बार्केनहामर कहते हैं, "यदि देश खास तौर पर गरीब हों और पर्याप्त धन न हो तो राहत संगठनों को जरूरतमंदों की मदद करनी पड़ती है. यह यूरोप में नया विकास है."

यूरोपीय संघ के कुछ देशों में रेड क्रॉस काफी समय से सक्रिय है. वहां राहत संगठन खाद्य पदार्थों को बांटने का कार्यक्रम चला रहे हैं जो चंदे की बदौलत चलता है. क्रिस्टॉफ बुटरवेगे बताते हैं कि गरीबी की घुन समाज के मध्य हिस्से को खा रही है. "इसकी वजह यह है कि ऐसी राजनीति की जा रही है जो उच्च वर्ग को राहत दे रही है, मसलन कर सुधारों के जरिए." आम तौर पर पूर्वी यूरोप के देश ज्यादा प्रभावित हैं क्योंकि वहां के लोगों के पास बचत का कम धन था और मध्य और पश्चिम यूरोप के मुकाबले वहां की सामाजित सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है.

संकट का मारा स्पेन

स्पेन में रेड क्रॉस ने पिछले साल देश के अंदर के जरूरतमंद लोगों के लिए चंदे का अभियान चलाया, न कि विकासशील देशों के गरीबों के लिए. इसके अलावा वहां ऐसे देशवासियों की मदद के लिए एक अभियान चलाया जा रहा है जिन पर बेरोजगारी का सबसे ज्यादा असर हुआ है. इस अभियान के तहत अगले दो साल में स्पेन के 3,00,000 जरूरतमंद लोगों के लिए 3 करोड़ यूरो जमा करने की योजना है.

पूरे देश में चंदा जमा करने के लिए केंद्र खोले गए हैं. क्रिस्टॉफ बुटरवेगे का कहना है, "यह गर्म पत्थर पर एक बूंद पानी की तरह है. इसकी मदद से कुछ लोगों की मदद की जा सकती है लेकिन यह समस्या का हल नहीं है." बेरोजगारी और गरीबी से निबटने के लिए सही आर्थिक और सामाजिक नीति की जरूरत है. करनीति के जरिए अमीरी और गरीबी के बीच की खाई को पाटने की जरूरत है.

रिपोर्ट: राखेल बेग/एमजे

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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