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दुनिया

यूरोप पहुंचा इबोला का खतरा

इबोला महामारी को अब तक पश्चिमी अफ्रीका से ही जोड़ कर देखा जा रहा था. लेकिन हाल ही में स्पेन की एक नर्स के संक्रमित हो जाने के बाद यूरोप में चिंता का माहौल है. जांच चल रही है.

शुरुआती जांच में कहा जा रहा है कि आइसोलेशन वॉर्ड में मरीज की देख रेख करने के बाद जब स्पेन की इस नर्स ने अपना सुरक्षा सूट उतारा, तो उस दौरान संक्रमित दस्ताने उसके चहरे को छू गए. नर्स के पति और दो अन्य डॉक्टरों की जांच चल रही है. इस बीच नर्स के कुत्ते को मार दिया गया है. पशु रक्षा संगठनों ने इसका विरोध किया है और जानवरों में इबोला के खतरों की जांच की मांग की है.

वहीं अमेरिका में इबोला के कारण एक व्यक्ति की मौत हो गयी है. सरकार ने जांच के आदेश दिए हैं ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि अस्पतालों में सुरक्षा के सही कदम उठाए जा रहे हैं. साथ ही पांच हवाई अड्डों पर यात्रियों की स्क्रीनिंग के भी आदेश दिए गए हैं.

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इसके अलावा जर्मनी में इबोला के तीसरे मरीज को भर्ती किया गया है. यह व्यक्ति सूडान का एक डॉक्टर है जो संयुक्त राष्ट्र के लिए पश्चिम अफ्रीका में काम कर रहा था. मरीज को लाइपजिग के अस्पताल के विशेष वार्ड में रखा गया है. ऐसे में इबोला का अफ्रीका से बाहर महामारी बन जाने का डर स्वाभाविक है.

हैम्बर्ग के वायरस विशेषज्ञ योनास श्मिट कानाजिट का कहना है कि स्पेन की नर्स के मामले से इबोला से लड़ने में यूरोप की तैयारियों में कोई बड़ा फर्क नहीं आएगा. डॉयचे वेले से बातचीत में उन्होंने कहा, "गलती तो हुई है और अब इस बात का पता लगाना होगा कि चूक कहां हुई. लेकिन जर्मनी के लिए चिंता की कोई बात नहीं है और ना ही हमें अचानक से रोकथाम के अपने कायदों में कोई बदलाव लाने की जरूरत है. हमारी तैयारियां दुरुस्त हैं."

मारबुर्ग मेडिकल कॉलेज के श्टेफन बेकर भी मानते हैं कि स्पेन जैसा मामला जर्मनी में होने के आसार कम हैं. हालांकि वे यह भी कहते हैं कि गारंटी किसी भी बात की नहीं है, "आपको इस बात का भरोसा तो रखना ही होगा कि अगर किसी डॉक्टर को खुद में ही बीमारी के लक्षण नजर आते हैं, तो वे फौरन इस बारे में सोचेंगे कि कहीं मुझे इबोला तो नहीं." बेकर का मानना है कि जर्मनी में जितना ध्यान इस वक्त दिया जा रहा है, डॉक्टर किसी भी तरह की चूक नहीं करेंगे.

हैम्बर्ग, फ्रैंकफर्ट, बर्लिन और म्यूनिख में ऐसे आइसोलेशन वॉर्ड बनाए गए हैं, जहां इबोला के मरीजों को दूसरों लोगों से अलग थलग रखा जा सकता है. बेकर बताते हैं कि डॉक्टरों और नर्सों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि यदि किसी को भी इबोला के लक्षणों के बारे में पता चले तो फौरन वायरस के लिए जांच शुरू की जाए. मरीज के खून का सैम्पल लिया जाए और बिना वक्त बर्बाद किए उसे हैम्बर्ग या मारबुर्ग जैसे सेंटरों में भेजा जाए. यहां कुछ ही वक्त में रिपोर्ट दे दी जाएगी ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि वह व्यक्ति इबोला से पीड़ित है या नहीं.

डरने वाली बात यह है कि इसी तरह के एहतियात स्पेन में भी बरते गए थे और इसके बावजूद वहां नर्स को संक्रमण हुआ. योनास श्मिट कानाजिट का कहना है कि ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि यह हुआ कैसे, "तभी हम भी इस गलती से सबक ले सकेंगे. यह वाकई भयानक है." फिलहाल स्पेन में उन सभी व्यक्तियों की जांच चल रही है जो इस नर्स के साथ संपर्क में आए.

जर्मनी में कुछ वक्त पहले एक इबोला संक्रमित व्यक्ति को इलाज के बाद अस्पताल से छुट्टी मिल गयी. श्मिट कानाजिट इस बारे में कहते हैं, "हमने देखा कि कैसे हैम्बर्ग में मरीज की सही देखभाल हुई और उसका इलाज हुआ. वहां किसी और को संक्रमण नहीं हुआ. ऐसा ही फ्रांस और ब्रिटेन में हुआ. और दरअसल स्पेन में भी. बस इस मामले में ना जाने चूक कहां रह गयी." उन्हें विश्वास है कि स्पेन में भी अन्य देशों की ही तरह नियमित अंतराल पर आइसोलेशन वॉर्ड के मरीजों की जांच होती है और इससे जुड़े सभी लोगों का सही प्रशिक्षण भी होता है, "हम बस अटकलें लगा सकते हैं, ऐसा सोच सकते हैं कि यह किसी व्यक्ति की गलती हो सकती है. लेकिन सही बात तो तभी पता चलेगी जब रिपोर्ट आ जाएगी."

स्टेफन बेकर को भी यकीन है कि यूरोप में हालात पश्चिमी अफ्रीका जैसे नहीं होंगे, "जर्मनी में यह जंगल की आग की तरह नहीं फैल सकता, हम यही संदेश देना चाहते हैं."

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