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दुनिया

यूरोप के 'नर्क' में प्रवासी मजदूर

इटली के टमाटर उद्योग में प्रवासी मजदूरों का इस्तेमाल गुलामों की तरह किया जा रहा है. कापोराली माफियाओं के लिए 'लाल सोना' तोड़ने वाले इन मजदूरों को ढ़ंग से सोना भी नसीब नहीं हो पा रहा.

दक्षिणी इटली में लंबे कद और चौड़े कंधे वाला घा​ना मूल का बाह, एक टूटी खिड़की से बाहर झांक रहा है. ​बाहर मक्के के खेतों को लहरा रही बेहद सर्द हवा से उसके चेहरे पर उमड़ रही परेशानी को साफ पढ़ा जा सकता है.

इतालवी प्रायद्वीप के दक्षिण पूर्वी सिरे पर फैला पुलिआ का ग्रामीण इलाका जैतून के विशाल पेड़ों के साथ ही अंगूर और टमाटर के बागानों के लिए भी जाना जाता है. यह इलाका सूखे पत्थर की चट्टानों और समुद्रतट से घिरा हुआ है.

24 साल के बाह और उसी की तरह के लाखों देश विहीन प्रवासियों ने कभी नहीं सोचा होगा कि 21वीं सदी के आधुनिक यूरोप में गर्गानो की इन पहाड़ियों के भीतर एक बेहद बदसूरत, रहस्यमयी और हिंसक दुनिया भी बसी है.

गुलामों की तरह बर्ताव

इटली के मजदूर संगठनों द्वारा की गई एक जांच ने इस सच को उजागर किया है. जरूरतमंद प्रवासियों की एक पूरी फौज को गैरकानूनी ढंग से काम करने वाले गिरोहों ने ग्रामीण इलाकों में टमाटर की फसल तोड़ने के काम पर लगा रखा है. इन प्रवासियों के साथ गुलामों की तरह बर्ताव किया जाता है. इसमें अधिकतर उत्तरी अफ्रीकी और पूर्वी यूरोप से आए प्रवासी शामिल हैं.

यूरोप के मौजूदा प्रवासी संकट के बाद से प्रवा​सी मजदूरों के शोषण के बारे में चिंताएं बढ़ी हैं. उसी दौरान यह बात सामने निकलकर आई है.

केरिग्नोला इलाके में बसी घाना बस्ती में अपने सैकड़ों साथियों के साथ रह रहे बाह कहते हैं, ''उन्होंने कहा वहां इटली में काम है. मैं यहां काम करने आया. अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने. पर यहां इटली में लोग जूझ रहे हैं. वे ढेर सारा काम करते हैं पर उन्हें कोई पैसा नहीं मिलता. यहां ना पानी है, ना ऐसा कोई साफ ​इलाका जहां रहा जा सके. ना ही कोई शौचालय है.''

राजधानी बारी और फोगिआ शहर के बीच की तलहटी में फैली हुई बस्तियों में घाना, नाइजीरिया, और सहारा देशों के साथ ही इराक और सीरिया से आए प्रवासी युवाओं का झुंड रह रहा है.

शोषण के आसान शिकार

इनमें से कई प्रवासियों ने इटली के अधिकारियों के पास शरण के लिए प्रार्थनापत्र दाखिल किए हैं. लेकिन उन पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं होने के चलते इन लोगों के पास इटली में काम करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है. ऐसे में ये लोग शोषण के आसान शिकार हो रहे हैं.

50 किलोमीटर दूर ऐसी ही सबसे बड़ी बस्ती 'इल घेटो रिग्नानो गार्गानीचे' है. यहां गत्ते और लकड़ी की बनी झो​पड़ियां हैं. गर्मियों में टमाटर तोड़ने के मौसम में जब तापमान तकरीबन 40 डिग्री हो जाता है, हजारों मजदूर इन्हीं झोपड़ियों में रहने को मजबूर होते हैं. यहां ना ही पानी है और ना ही शौचालय की कोई व्यवस्था. और इन मजदूरों पर नजर बनाए रखने के लिए गिरोह के सदस्य तैनात रहते हैं जिन्हें कापोराली कहा जाता है.

इटली की अर्थव्यवस्था में कृषि को सबसे अधिक संगठित अपराध वाले क्षेत्र के बतौर जाना जाता है. खेतों से लेकर सुपरमार्केट के बीच की सप्लाई चेन में इसका असर हर जगह होता है और बेहद बड़ा टमाटर उद्योग भी इससे अछूता नहीं है.

शोषण की उपज लाल सोना

कंपनियों, ट्रेड यूनियन और एनजीओ के साझी पहल पर बने एथिकल ट्रेडिंग इनिशिएटिव (ईटीआई) की ओर से जारी एक रिपोर्ट बताती है कि भारी तादात में मौसमी कामगार मजदूर बेहद गरीबी में पानी, शौचालय, रहने और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में जिंदगी बिता रहे हैं.

इस रिपोर्ट पर इटली के कृषि मंत्रालय का पक्ष जानने के लिए किए गए कई फोन कॉल्स का कोई जवाब नहीं मिला.

इटली दुनियाभर में प्रोसेस्ड टमाटर उत्पादों के उत्पादन में तीसरे पायदान पर है. 2014 में जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और रूस जैसे देशों को यहां से 50 लाख टन टमाटर उत्पाद निर्यात हुआ जिसकी कीमत तकरीबन 1.5 अरब यूरो है. लेकिन इटली के कृषि उद्योग का यह 'लाल सोना' प्रवासी मजदूरों के शोषण से उपजाया जा रहा है.

लूट का गणित

2011 में प्रवासी मजदूरों के शोषण के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व करने वाले इवान सैग्नेट कहते हैं कि कापोराली एक दिन में हजारों यूरो कमा लेते हैं ज​बकि मजदूरों को 20 यूरो भी नहीं मिलते, ''वे मजदूरों को खाना और पानी लाने की इजाजत भी नहीं देते. वे मजदूरों को बस्ती से खेतों में आने जाने के लिए 5 यूरो हर रोज का किराया वसूलते हैं. वे वहां 3.50 यूरो में खाना बेचते हैं और 1.50 यूरो में पानी.''

सैग्नेट आगे बताते हैं, ''वे मजदूरों के पास से उनके सारे कागज अपने पास जब्त कर लेते हैं. इससे मजदूर भाग भी नहीं सकता और वे उसे एक तरह का गुलाम बना लेते हैं. वे उनसे बस्ती में रहने और यहां त​क कि सूखी लकड़ी को इस्तेमाल करने का भी किराया वसूलते हैं.''

सैग्नेट इटली के ट्यूरिन में इं​जीनियरिंग की पढ़ाई के लिए एक छात्रवृत्ति पर पढ़ने आए थे. अपनी एक परीक्षा के छूट जाने के चलते उनकी छात्रवृत्ति खत्म हो गई. इसके बाद उन्हें अपने लिए कमाई की व्यवस्था करनी पड़ी. इसी दौरान वे 2011 में लेसे शहर के पास नार्डो के टमाटर के खेतों में मजदूरी करने आए, तो उन्हें मजदूरों के इस शोषण का पता चला. वे बताते हैं कि मजदूरों को सुबह 3 बजे से शाम 6 बजे तक काम करना होता था और इस दौरान तापमान 40 डिग्री पार कर जाता था. 500 लोग महज 200 लोगों के लिए बने टैंटों में बिना स्वास्थ सुविधाओं के बसर कर रहे थे.

सैग्नेट का आंदोलन

जब खेतों के मालिक ने टमाटर तोड़ने का तरीका बदला तो मजदूरों के लिए काम करना और कठिन हो गया. लेकिन इसके लिए उनका पैसा नहीं बढ़ाया गया. इसके खिलाफ सैग्नेट ने बगावत कर दी और सारे मजदूर उनके नेतृत्व में हड़ताल पर चले गए.

इस हड़ताल ने इटली के मीडिया का ध्यान खींचा और पुलिआ में गैरकानूनी ढंग से हो रहे मजदूरों का शोषण करने वाले 16 गिरोहों के मुखिया गिरफ्तार किए गए. तब से इटली की संसद ने इसे अपराध घोषित कर दिया है ​लेकिन इसके बावजूद यह कारोबार जारी है. इसके खिलाफ अभियान चलाने वालों का कहना है कि पुलिस और प्रशासन इसमें कोई दखल नहीं देता.

सेग्नेट ने अपनी डिग्री पूरी करने के बाद दो किताबें लिखीं हैं और अब वे इटली के लेबर यूनियन के जनरल परिसंघ सीजीआईएल के साथ काम कर रहे हैं. उनका कहना है कि इटली के उत्पादन तंत्र में सुधार के लिए लंबी लड़ाई की जरूरत है.

आरजे/आईबी (थॉम्सन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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