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दुनिया

यूरोपीय संघ के लिए चुनौतियों का साल

साल 2016 यूरोप के लिए महत्वपूर्ण साल है. इस साल फैसला होगा कि यूरोपीय संघ अपनी मौजूदा शक्ल में रहेगा या नहीं. इस समय यूरोप सिर्फ शरणार्थी संकट ही नहीं बल्कि अपनी अस्मिता का संकट भी झेल रहा है.

2016 में ब्रिटेन यूरोपीय संघ छोड़ने का फैसला कर सकता है. साल के शुरू में यह सुनने में भले ही नाटकीय लग रहा हो, लेकिन साल की दूसरी छमाही में ब्रिटेन के नागरिक जनमत संग्रह में फैसला करेंगे कि उनका देश यूरोपीय संघ में रहेगा या नहीं. अगर ब्रिटेन के लोग यूरोपीय संघ के विरोध में फैसला करते हैं तो ईयू अपना तीसरा सबसे बड़ा सदस्य खो देगा. अगर ऐसा होता है तो पूरा यूरोप विघटन की प्रक्रिया का शिकार हो सकता है और जैसा कि बहुत से लोगों को डर है राष्ट्रवादी ताकतें सिर उठा सकती हैं.

पिछले साल के अंत में एक ओर चेतावनियां दी जा रही थीं कि यूरोप विघटन के कगार पर है तो दूसरी ओर उत्तरी यूरोप में एक के बाद एक देश में हुए चुनावों में राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत हुई हैं. पोलैंड की नई दक्षिणपंथी सरकार ने पिछले हफ्तों में न्यायपालिका और मीडिया में सुधार के जो कदम उठाए हैं वे यूरोपीय संघ की बहुलवादी लोकतांत्रिक परंपरा से मेल नहीं खाते. इसके अलावा उसने यूरोप के साथ असहयोग का रवैया अपना रखा है. जर्मन सरकार इस पर चिंतित तो है लेकिन उसका कहना है कि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में इस तरह के उतार चढ़ाव आते रहते हैं लेकिन अंत में सरकारों को समझ में आता है कि यूरोपीय संघ के साथ सहयोग से उनके देशों को सबसे ज्यादा फायदा है.

शरणार्थी संकट

इस साल यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी चुनौती रहेगी शरणार्थी संकट. अब तक साझा हल ढूंढने के प्रयास विफल रहे हैं. इस साल करीब 15 लाख शरणार्थियों के आने से यूरोप के बहुत से देशों के लिए समस्याएं तो खड़ी हुई ही हैं, सदस्य देशों के बीच आपसी तनाव भी बढ़ा है. जर्मन चांसलर शरणार्थियों को सदस्य देशों के बीच बांटने की वकालत कर रही हैं तो कई अन्य सरकार प्रमुखों की तरह चेक गणतंत्र के प्रधानमंत्री बोहुस्लाव सोबोत्का ने शरणार्थी संकट में न्यौता देने वाली नीति के लिए जर्मनी और चांसलर की आलोचना की है.

यूरोपीय संसद के प्रमुख मार्टिन शुल्स और ऑस्ट्रिया के चांसलर वैर्नर फायमन एकजुटता के अभाव के कारण पूर्वी यूरोपीय देशों को खुलेआम ईयू की वित्तीय मदद काटने की धमकी दे रहे हैं. यदि इस साल भी 2015 की ही तरह तुर्की और भूमध्य सागर से होकर शरणार्थियों का यूरोप में आना जारी रहता है तो सीमा की सुरक्षा और शरणार्थियों के बंटवारे को लेकर होने वाली बहस और तीखी हो जाएगी. उधर हंगरी और पोलैंड की राष्ट्रवादी सरकारें ईयू की कानूनसम्मत संरचनाओं को नुकसान पहुंचाने में लगी हैं. इस साल इस बात पर भी बहस हो सकती है कि यूरोपीय संघ और पोलैंड के साझा मूल्य क्या हैं?

अतिवादी रुझान

जैसे ये विवाद काफी न हों, यूरोपीय संघ की आर्थिक और वित्तीय नीतियों पर विवाद बना हुआ है. इटली के प्रधानमंत्री मातेओ रेंसी बचत और सुधारनीति का विरोध कर रहे हैं जिसपर खासकर जर्मनी बहुत जोर दे रहा है. ग्रीस में वित्तीय संकट के कारण वामपंथी सरकार सत्ता में आई है. इस बीच ग्रीस और पुर्तगाल की वामपंथी सरकारें बचत के लक्ष्यों में ढील का इंतजार कर रही हैं. जनवरी में ही ग्रीस का वित्तीय संकट फिर से भयानक रूप ले सकता है यदि प्रधानमंत्री अलेक्सिस सिप्रास की सरकार पेंशन में सुधार के अपने वायदे को संसद में पास नहीं करवा पाती है.

बहुत से दूसरे यूरोपीय देशों में भी बहुत धीरे से कम हो रही बेरोजगारी दरों के कारण वामपंथी पार्टियों के लिए समर्थन बढ़ रहा है. यूरोप को स्थायी आर्थिक प्रगति की जरूरत है, लेकिन फिलहाल उसके कोई आसार नहीं दिख रहे हैं. ईयू के सबसे बड़े देशों जर्मनी और फ्रांस के नजरिए से आर्थिक प्रगति की बहुत जरूरत थी ताकि आर्थिक और मौद्रिक मोर्चे पर एकीकरण के कदम उठाए जा सकते. जर्मन सरकार ने अपना प्रस्ताव तय कर लिया है. लेकिन फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसोआ ओलांद और चांसलर मैर्केल के बीच कब तक सहयोग चलेगा पता नहीं. फ्रांस शरणार्थी संकट में डर कर कदम उठा रहा है तो जर्मनी को लगातार हो रहे बजट घाटे के कारण फ्रांस पर संदेह है.

जर्मनी की समस्या

इससे अलग भी जर्मन चांसलर को इस साल और विरोध के लिए तैयार रहना होगा. इसकी वजह यूरोप में जर्मनी की बढ़ी हुई भूमिका भी है. जर्मन सरकार ने 2015 में ग्रीस और यूक्रेन के अलावा शरणार्थी संकट में केंद्रीय भूमिका निभाई है. जर्मनी विदेश मंत्रालय इतना सक्रिय है कि वह इस बीच ईरान और सीरिया जैसे मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के साथ मिलकर वार्ता कर रहा है. यह सिर्फ इटली के प्रधानमंत्री को परेशान नहीं कर रहा है जो अब जर्मनी के वर्चस्व की शिकायत कर रहे हैं. इटली भी सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का दावेदार है. इसके अलावा हर अहम मुद्दे पर ईयू के सदस्य देशों को जर्मन दृष्टिकोण पर ध्यान देना पड़ रहा है.

इसने यूरोपीय संघ के अंदर सदस्य देशों के बीच खाई बढ़ा दी है. कम से कम पहली नजर में. जर्मन सरकार ने भी इस समस्या को पहचाना है. इसलिए वह इस साल कई देशों के साथ अलग अलग या मिलजुलकर नई पहलकदमियां कर रही हैं. इटली के साथ वह गृहयुद्ध से पीड़ित लीबिया में शांति लाने के लिए सहयोग करेगा. इस पहल में इटली को शामिल करने से चांसलर मैर्केल और प्रधानमंत्री रेंसी से रिश्तों में भी सुधार हो सकता है.

एमजे/आरआर (रॉयटर्स)

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