यूनेस्को में वोट नहीं दे सकेगा अमेरिका | दुनिया | DW | 08.11.2013
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दुनिया

यूनेस्को में वोट नहीं दे सकेगा अमेरिका

दुनिया की संस्कृति, विज्ञान और शिक्षा पर अमेरिकी प्रभाव को एक करारा झटका लगा है. दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को में अमेरिका के वोट देने का अधिकार खत्म हो गया है. पैसा न देने की वजह से छिना अधिकार.

अमेरिका ने यूनेस्को का पैसा एक फैसले के विरोध में रोक रखा है. यह फैसला 2011 में फलीस्तीन को यूनेस्को का सदस्य बनाने का था. इस्राएल और अमेरिका ने विरोध जताने के लिए यूनेस्को को पैसा देना बंद कर दिया. इन दोनों देशों के पास शुक्रवार सुबह तक का समय था कि वो या तो पैसा जमा करते या फिर अपनी स्थिति के बारे में जानकारी देते. दोनों ने ऐसा नहीं किया, इस वजह से यूनेस्को के नियमों के तहत उनके वोटिंग का अधिकार अपने आप ही खत्म हो गया.

अमेरिका हर साल यूनेस्को को करीब 8 करोड़ डॉलर देता है जो उसके कुल राजस्व का करीब 22 फीसदी है. अमेरिका के पैसा न देने की वजह से संयुक्त राष्ट्र की इस एजेंसी को आर्थिक दिक्कत का सामना करना पड़ा. पिछले दो साल में होलोकॉस्ट एजुकेशन और सूनामी रिसर्च जैसे कई कार्यक्रम बंद कर देने पड़े. अमेरिका में कई लोग इस बात से चिंतित हैं कि उनका देश यूनेस्को का एक गैरप्रभावशाली सदस्य बनने की राह पर है. उन्हें डर है कि शिक्षा के जरिए आतंकवाद से लड़ने, लैंगिक समानता और प्रेस की आजादी जैसे मुद्दों पर अमेरिकी आवाज कमजोर पड़ जाएगी. कुछ लोगों का यह भी मानना है कि यूनेस्को में अमेरिका के कमजोर होने से इस्राएल विरोधी भावना बढ़ेगी क्योंकि यहां क्षेत्रीय विवाद के कारण अरब नेतृत्व में इस्राएल की आलोचना हमेशा से एक मुद्दा रहा है.

अप्रभावी अमेरिका

यूनेस्को के लिए अमेरिका की राष्ट्रीय आयुक्त फाइलिस मागराब ने कहा, "हम पहले जैसा दम नहीं रख पाएंगे. हमारे पास सारे हथियार नहीं होंगे, हमारा हथौड़ा ही नहीं होगा." यूनेस्को मामले की वजह से अमेरिकी कानूनों की भी आलोचना हो रही है. इन कानूनों की वजह से ही फलीस्तीन के सदस्य बनते ही संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी को भुगतान रुक गया. जिन देशों के वोट देने का अधिकार खत्म हुआ है उनके नाम शनिवार को यूनेस्को की आम सभा में पढ़े जाएंगे.

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फलीस्तीन से मुश्किल

यूनेस्को में इस्राएल के राजदूत नीमरोद बारकान ने समाचार एजेंसी एपी से कहा कि उनका देश अमेरिका के उस फैसले का समर्थन करता है जिसमें, "फलीस्तीन जैसे किसी अस्तित्वहीन इलाके को शामिल कर यूनेस्को या किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन के राजनीतिकरण करने का विरोध किया जा रहा है."

यूनेस्को को भले ही दुनिया भर की संस्कृतियों को अपनी विरासत में शामिल करने के कार्यक्रम के लिए जाना जा रहा हो लेकिन इसका प्रमुख मिशन एक गैर चरमपंथी संगठन बनाना था. 1946 में जब यह एजेंसी बनाई गई, तब अमेरिका इसके संस्थापकों में था और तब इसकी बुनियाद इसी सोच पर रखी गई थी. आजकल यह लोगों तक साफ पानी की पहुंच, लड़कियों की शिक्षा, गरीबी मिटाने, अभिव्यक्ति की आजादी को बढावा और हिंसक चरमपंथ से बचने के लिए रचनात्मक क्षमताओं को बढ़ावा देने के लिए काम करता है.

पैसे की कमी की वजह से यूनेस्को के कई कार्यक्रमों में पहले ही कटौती की जा चुकी है. इनमें एक कार्यक्रम इराक में पानी की सुविधा बहाल करने में मदद करने के लिए था. पैसे की कमी की वजह से अफ्रीका में होलोकॉस्ट और नरसंहार के बारे में जागरूकता का कार्यक्रम खतरे में है. इसके जरिए दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान यहूदियों के नरसंहार का उदाहरण दे कर अफ्रीका में अहिंसा, समानता और जातीय सहिष्णुता के बारे में जागरुकता फैलाने की योजना है. इस कार्यक्रम का खटाई में पड़ना खासतौर से अमेरिका के लिए बड़ा झटका होगा, क्योंकि 2002 में दोबारा एजेंसी में शामिल होने के बाद अमेरिका ने बहुत आक्रामक रूप से एजेंसी के इस एजेंडे को आगे बढ़ाया है. संगठन की सोच से मतभेद होने के कारण 18 साल तक अमेरिका इससे बाहर रहा था.

एनआर/एएम (एपी)

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