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मनोरंजन

यूक्रेनियों ने खोजा 'लाइन लगाऊ' पेशा

सरकारी दफ्तरों में लोगों की लंबी कतार सिर्फ भारत में ही नहीं लगती है, यूक्रेन भी 'लाइन में लगे रहो' वाली संस्कृति से परेशान है. अब वहां फुर्सत वाले कुछ लोगों ने पैसे लेकर दूसरों के लिए लाइन में नंबर लगना शुरू कर दिया है.

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अपनी बारी का इंतजार

'मेरा नंबर कब आएगा.' यह जुमला भारतीय है, लेकिन यूरोपीय देश यूक्रेन पर भी सटीक बैठता है. देश के कई शहरों में सरकारी दफ्तरों के बाहर लोगों की लंबी कतार लगना आम बात है. धूप, जाड़े या बरसात के बावजूद लोगों को लाइन में लगे रहना पड़ता है. ताकि उनका नंबर गुल न हो जाएगा.

इन दिनों अभूतपूर्व गर्मी ने लोगों की मुश्किलें और बढ़ा रही है. तेज धूप और ऊंचे तापमान की वजह से लोग लाइन में खड़े तो रहे हैं लेकिन झल्लाए हुए. कोई दफ्तर, कोई घर का कामकाज छोड़कर आता है लेकिन लाइन है कि खत्म ही नहीं होती.

लोगों की इस समस्या का इलाज न सरकार के पास है, न सरकारी विभागों के पास.

हल है कि अथाह फुर्सत में रहने वाले बेरोजगारों के पास. राजधानी कीव में इन

Überschwemmung in Bangladesch

भारत में भी लोग लाइन से परेशान

दिनों कई बेरोजगार अन्य लोगों के लिए लाइन में खड़े होकर नंबर लगा रहे हैं. इसके लिए वह चार यूरो या पांच डॉलर लेते हैं.  ये लोग दूसरों के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते हैं और बारी आने से पहले फोन कर पैसा देने वाले को बुला लेते हैं. कहते हैं, ''आ जाइए, आपकी बारी आ गई है.''

इन लोगों को प्रोफेशनल क्यूअर यानी 'पेशेवर लाइन लगाऊ' का नाम दिया गया है. दो साल से बेरोजगार बैठे इगोर भी अब एक पेशेवर लाइन लगाऊ बन गए हैं. वह कहते हैं, ''अगर बारिश न हो तो मुझे घंटों तक लाइन में खड़े रहने में कोई दिक्कत नहीं. मेरे पास मोबाइल फोन है, मैं लाइन में खड़ा रहते हुए उस पर गेम खेलता रहता हूं.'' आम तौर पर लाइन लगाऊ एक दिन में 10 से 15 डॉलर कमा लेते हैं. यूक्रेन के हिसाब से यह एक दिन गुजारने के लिए ठीक ठीक पैसा है.

लाइन में खड़े होने के धंधे को देखते हुए, मैटिश्वेटिज नामकी एक कंपनी ने अब दस लाइन लगाऊ नियुक्त कर दिए है. लोग फोन और इंटरनेट के जरिए कंपनी से संपर्क करते हैं और लाइन लगाऊ की मांग कर लेते हैं. मैटिश्वेटिज का कहना है, ''हमें ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो कठिन परिस्थितियों में धैर्य के साथ इंतजार कर सकें.''

वैसे हाल के वर्षों में लाइन लगाऊ का पेशा भारत में भी खूब हिट हुआ है. कियोस्क के नाम से चलने वाली कई छोटी दुकानें लोगों के बिजली, पानी, टेलीफोन के बिल जमा करवाती हैं. गैस के कनेक्शन हों या पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस का काम, दलाल बखूबी करवा देते हैं. फर्क इतना है कि भारत के दलाल कई बार लाइन में लगे बिना ही 'सेटिंग' से यह सारे काम करवा देते हैं.

रिपोर्ट: एजेंसियां/ओ सिंह

संपादन: ए कुमार