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दुनिया

यूएन दूत बुलाने का फैसला जल्दबाजी में: श्रीलंका

श्रीलंका ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने अपने दूत को वापस बुलाने का फैसला जल्दबाजी में लिया है. श्रीलंकाई सेना पर युद्धापराध के आरोपों की यूएन की प्रस्तावित जांच के खिलाफ हो रहे हैं प्रदर्शन.

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कोलंबो में यूएन मुख्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शनों के बाद संयुक्त राष्ट्र ने श्रीलंका से अपने दूत वापस बुलाने का फैसला लिया है. हालांकि विदेश मंत्री गामिनी लक्ष्मण पियरिस के मुताबिक बान की मून के प्रतिनिधि नील बुहने को बता दिया गया था कि विरोध प्रदर्शन शुक्रवार को थम जाएंगे. पियरिस ने श्रीलंका की संसद को संबोधित करते हुए कहा कि इस आश्वासन के बावजूद संयुक्त राष्ट्र ने जल्दबाजी दिखाते हुए बुहने को न्यू यॉर्क बुला लिया.

Sri Lanka 19. Mai

श्रीलंकाई सरकार यूएन के इस फैसले पर खेद जता रही है. संयुक्त राष्ट्र ने कोलंबो में अपना ऑफिस बंद कर दिया है. कोलंबो में संयुक्त राष्ट्र विकास केंद्र के बाहर पिछले कुछ दिनों में जबरदस्त प्रदर्शन हुए. प्रदर्शनकारी मांग कर रहे थे कि तमिल विद्रोही संगठन एलटीटीई के खिलाफ लड़ाई के आखिरी दिनों में सेना पर तमिलों के खिलाफ ज्यादती के जो आरोप लगे, उनकी जांच यूएन से न कराई जाए.

विरोध का नेतृत्व श्रीलंका के आवास मंत्री विमल वीरावान्सा कर रहे थे जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के बाहर आमरण अनशन भी शुरू किया है. वीरावान्सा ने शुक्रवार को कहा कि वह कैबिनेट पद से इस्तीफा दे रहे हैं. श्रीलंका की सरकार पर आरोप लगे हैं कि उसने इन विरोध प्रदर्शनों को हवा दी है और अपने इस्तीफे की बात कह कर वीरावान्सा इन आरोपों से ध्यान हटाना चाहते हैं.

राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को लिखे एक पत्र में वीरावान्सा ने कहा है कि वह सरकार के लिए शर्मिंदगी का सबब नहीं बनना चाहते हैं. इसलिए वह कैबिनेट से इस्तीफा देकर संघर्ष जारी रखना चाहते हैं. श्रीलंका के कई कैबिनेट मंत्री वीरावान्सा से मिले हैं और उनकी हड़ताल पर सहानुभूति जताई है. हालांकि विपक्ष उनकी इस हड़ताल को तमाशा बता रहा है. वीरावान्सा के समर्थकों ने रूस के दूतावास तक मार्च कर उससे इस मामले में दखल देने की मांग की है.

वहीं यूएन महासचिव ने अपने प्रवक्ता के जरिए श्रीलंका को याद दिलाया है कि संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों का मेजबान होने और संप्रभु राष्ट्र होने के नाते श्रीलंका को अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए. बान की मून के प्रवक्ता ने कड़े शब्दों में कहा कि कोलंबो में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के कामकाज को सुचारू रूप से होने और प्रदर्शनों पर काबू पाने में सरकार से मदद नहीं मिली जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.

मई 2009 में श्रीलंकाई सेना ने तमिल विद्रोही संगठन एलटीटीई का सफाया कर दिया था और उसके प्रमुख प्रभाकरण को मार गिराया. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि सैन्य कार्रवाई के आखिरी दिनों में करीब 7,000 तमिल भी मारे गए और यूएन उन पर हुई कथित ज्यादतियों की जांच करना चाहता है. श्रीलंका में निजी चैनलों ने प्रदर्शन भड़काने में सरकार की भूमिका की आलोचना की है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/एस गौड़

संपादन: ए कुमार

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