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दुनिया

यमन में खतरनाक खेल

यमन में सऊदी अरब और उसके साथियों की सैनिक कार्रवाई एक ऐसा रोमांच है जिसके नतीजे का पता नहीं. डॉयचे वेले के राइनर सोलिच का कहना है कि इसमें हारने वाले अभी से तय हैं.

सऊदी अरब ने अपने नजरिए से यमन में ब्रेक लगाया है. हॉसी विद्रोहियों और सेना का एक हिस्से के देश के उत्तरी हिस्से और राजधानी साना पर कब्जे के बाद जब पूरे दक्षिणी हिस्से पर कब्जे का खतरा पैदा हो गया तो अब रियाद दूसरे अरब साथियों के साथ हथियार को बोलने दे रहा है. हॉसी के ठिकानों पर बमबारी की गई है, थलसेना को भेजना अगला कदम हो सकता है.

सैनिक कार्रवाई का औपचारिक लक्ष्य राष्ट्रपति अब्द रब्बाह मंसूर हादी को फिर से उनकी कुर्सी पर बिठाना और यमन की सुरक्षा और स्थिरता है. पहला लक्ष्य कामयाब हो सकता है, दूसरा कतई नहीं. गरीब और विवादग्रस्त यमन में सुरक्षा और स्थिरता सैन्य ताकत से नहीं लाई जा सकती. उसके लिए राजनीतिक सहमति जरूरी है, जिसमें सभी अहम ताकतें शामिल हों.

सत्ता का प्रदर्शन

मिस्र, जॉर्डन, कतर, संयुक्त अरब अमीरात, अमीरात और पाकिस्तान जैसे प्रभावी देशों का सैन्य रूप से एक साथ आना ताकत का असाधारण प्रदर्शन है. लेकिन उसे गलती से यमनी जनता के साथ एकजुटता नहीं समझा जाना चाहिए. यमन को उसके धनी पड़ोसी वैसे ही भिखारी की तरह रखेंगे जैसे अतीत में रखा है. इन भ्राता देशों और खासकर सऊदी अरब के लिए यमन एक बड़े खेल का हिस्सा भर है जो इराक, सीरिया और लेबनान में भी खेला जा रहा है. उनका मकसद इलाके में शिया ईरान के प्रभाव को कम करना है.

सौभाग्य से अब तक ईरान सीरिया या इराक की तरह यमन की लड़ाई में सक्रिय हिस्सा नहीं ले रहा है. उसके विरोधियों की सैनिक ताकत बहुत बड़ी है. और क्षेत्रीय संघर्ष का जोखिम ईरान के लिए पूरी तरह विस्फोटक होगा. जो भी हो, यमन में खतरनाक खेल खेला जा रहा है क्योंकि ईरान के पास दूसरे साधन भी हैं. तेहरान हॉसियों को चुपचाप और हथियार और सैनिक सलाह दे सकता है. इसके अलावा वह सऊदी अरब और बहरीन में शिया आबादी को सुन्नी शासकों के खिलाफ विद्रोह के लिए उकसा सकता है. ईरान के लिए भी सवाल एकजुटता का नहीं है, वह अपनी ताकत मजबूत करना चाहता है.

जीत और हार

महत्वपूर्ण यह देखना होगा कि पूर्व राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह क्या रवैया अपनाते हैं. रंग बदलने वाले पुराने राष्ट्रपति ने हॉसी के साथ समझौता कर लिया था, ताकि खुद सत्ता में वापस लौट सकें. इस इरादे को फिलहाल अरब देशों ने सैनिक कार्रवाई कर चकनाचूर कर दिया है. लेकिन अभी भी सेना का बड़ा हिस्सा उनका समर्थन करता है. यदि यह हिस्सा भविष्य में भी हॉसियों के साथ लड़ता है, तो यमन में लड़ाई महंगी साबित हो सकती है. तेहरान और उसके साथ जुड़े शिया संगठन पहले ही पूरे इलाके के लिए चेतावनी दे रहे हैं.

हो सकता है कि यह सिर्फ गीदड़भभकी हो, पश्चिम एशिया में पहले से ही जारी धार्मिक तनाव सैनिक कार्रवाई से और बढ़ेगा. इसका फायदा अल कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसी कट्टरपंथी ताकतों के अलावा शिया हार्डलाइनरों को होगा. हार होगी नागरिकों की जिनके नाम पर यह छाया युद्ध लड़ा जा रहा है. और उन राजनीतिक ताकतों की जो यमन में संवाद, विकास और नवीकरण का समर्थन कर रहे हैं.

राइनर सोलिच

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