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विज्ञान

म से मलेरिया, मलेरिया से मौत

एक मच्छर, आपको मलेरिया का रोगी बना सकता है. भारत में हर साल करीब 40 हजार लोग इस बीमारी से मारे जाते हैं. जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं ने इस बीमारी के खतरे को और बढ़ा दिया है.

वैज्ञानिक परिभाषा के लिहाज से देखें तो मलेरिया मादा एनाफिलीज मच्छर के काटने से होने वाली बीमारी है. मलेरिया के विषाणु से संक्रमित मच्छर अपनी लार के साथ इस विषाणु को इंसान के शरीर में पहुंचा देता है. खून के जरिए शरीर में घुसते ही विषाणु यकृत (लीवर) तक पहुंच जाता है. वहां विषाणु परिपक्व हो जाता है और बच्चे पैदा करने लगता है. विषाणुओं की संख्या बढ़ने के साथ ही शरीर बीमार होने लगता है. शुरुआत में रोगी को शरीर में दर्द के साथ बुखार, सिरदर्द, उल्टी या गले में सूखे कफ की शिकायत होती है. ऐसा होने पर अगर खून की जांच कराई जाए तो मलेरिया का पता आसानी से चल जाता है.  लापरवाही की जाए या समय से इलाज न किया जाए तो रोगी कोमा में जा सकता है या उसकी मौत भी हो सकती है.

2010 में विश्व स्वास्थ संगठन को दुनिया भर में मलेरिया के 21.9 करोड़ मामले मिले. अनुमान है कि उस साल छह से 12 लाख लोगों की मौत इस बीमारी की वजह से हुई. ज्यादातर मौतें अफ्रीकी महाद्वीप में हुई. मृतकों में ज्यादातर बच्चे थे, जो मच्छरों के होने वाले इस खतरें को भांप न सके. उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी वयस्कों की तुलना में कमजोर थी.

आधी दुनिया में मलेरिया

मलेरिया का मच्छर सामान्यतया गर्म इलाकों में पाया जाता है. जिन गर्म इलाकों में बारिश होती रहती है या फिर या गंदा पानी ठहरा हुआ रहता है, वहां मलेरिया होने की संभावनाएं ज्यादा रहती हैं. भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, म्यांमार, इंडोनेशिया, मध्य व दक्षिण अफ्रीकी देशों और दक्षिण अमेरिका के कुछ देशों में मलेरिया का खतरा बड़ा है. इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के मुताबिक भारत में हर साल इस बीमारी की वजह से 40,297 लोग मारे जाते हैं. यह संख्या सरकारी आंकड़ों से 20 से 30 गुना ज्यादा है. काउंसिल की पूर्व प्रमुख डॉक्टर पद्म सिंह प्रधान की अगुवाई में बनाई गई समिति के मुताबिक हर साल 97 लाख भारतीयों को मलेरिया अपनी चपेट में लेता है.

विश्व स्वास्थ संगठन के मुताबिक दुनिया में हर नौ मिनट में एक बच्चा मलेरिया से मारा जाता है. हर साल दुनिया भर में मलेरिया से साढ़े छह लाख मौतें होती है. अफ्रीकी देशों में तो हालत और भयावह है. वहां हर साल करीब छह लाख लोग मलेरिया से मारे जाते हैं. इनमें 85 फीसदी बच्चे होते हैं. ऐसे बच्चे पांच साल की जिंदगी भी नहीं देख पाते. गर्भवती महिला को अगर मलेरिया हो तो बीमारी कोख में पल रहे बच्चे तक भी पहुंच जाती है. 

अब यूरोप में भी घबराहट

मलेरिया को अब तक गर्म व गरीब देशों की बीमारी माना जाता रहा, लेकिन जलवायु परिवर्तन अब इस खतरे का दायरा अमीर और ठंडे देशों तक फैलाने जा रहा है. बढ़ते तापमान की वजह से अब मच्छर अमेरिका और यूरोप के ठंडे देशों तक पहुंचने लगे हैं. वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात साफ हो चुकी है कि बढ़ती गर्मी की वजह से अगले 50 साल में मलेरिया संक्रमण नए इलाकों तक फैल जाएगा. यूनिवर्सिटी ऑफ लीवरपूल के अध्ययन के मुताबिक 2050 तक अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय इलाकों में मलेरिया का खतरा बहुत कम हो जाएगा. वहां गर्मी काफी बढ़ेगी और बारिश कम होगी, इसकी वजह से मच्छरों को पनपने का आदर्श माहौल नहीं मिलेगा. वहीं मलेरिया की बीमारी उत्तरी अफ्रीका और दक्षिण यूरोप की तरफ सरकेगी. ब्रिटेन के वैज्ञानिकों को आशंका है कि अगर जलवायु परिवर्तन के साथ मलेरिया यूरोप में लौटा तो परिणाम ज्यादा घातक होंगे. बीते 100 साल में मलेरिया का विषाणु कुछ दवाओं के लिए प्रतिरोधक क्षमता हासिल कर चुका है.

मलेरिया से बचाव

इस बीमारी से बचाव करना कोई भारी चुनौती नहीं है. जरूरत है तो सावधानी की. भारत के गांवों और छोटे शहरों में लंबे वक्त से मच्छरदानी का इस्तेमाल किया जाता रहा है. विश्व स्वास्थ संगठन और तमाम वैज्ञानिक भी यह कहते हैं कि मच्छरदानी का इस्तेमाल और दवा का छिड़काव मलेरिया से निपटने का अब तक सबसे कारगर तरीका है. गर्म देशों में मच्छर भगाने के लिए सस्ती तरकीबों का भी इस्तेमाल किया जाता है.

इन उपायों के साथ साफ सफाई की भी जरूरत है. गंदे पानी को एक जगह टिकने न दिया जाए तो नए मच्छर पैदा नहीं हो सकते. इसके अलावा घरों के अंधेरे कोनों में जमा गैरजरूरी पुराने सामान को भी अगर हटा दिया जाए तो मच्छरों को छुपने की जगह नहीं मिलती है. कई देशों में गंदे पानी में मच्छर के लारवा को मारने के लिए मिट्टी का तेल छिड़क दिया जाता है. यह कारगर तो है लेकिन इससे प्रदूषण भी होता है. बेहतर है पानी या तो सूखा दिया जाए या फिर मिट्टी ढक दिया जाए. अगर पानी छोटे मोटे तालाब में हो तो उसकी समय समय पर सफाई ज्यादा बढ़िया विकल्प है.

ओएसजे/एनआर (एएफपी, रॉयटर्स, डीपीए)

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