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दुनिया

म्यूनिख की दीवारों पर सजा इतिहास

म्यूनिख शहर स्ट्रीट आर्ट को बढ़ावा देना चाहता है. ग्रैफिटी को वैध बनाने में एक सवाल है, जो काम छिप छिप कर करने में मजा आता है, वैध तरीके से करने में वह खत्म तो नहीं हो जाएगा...

स्ट्रीट आर्ट का ही एक लोकप्रिय रूप है, ग्रैफिटी. यह हमेशा से ही किसी जगह की उपसंस्कृतियों को जाहिर करने का एक सशक्त माध्यम रही है. इसीलिए किसी भी तरह की सब्सिडी या समर्थन इन उपसंस्कृतियों की गहराई में मौजूद विद्रोह की मंशा के खिलाफ जाती है. स्प्रे पेंटिंग से जहां तहां अपने संदेश उकेरते ग्रैफिटी कलाकार कानून के दायरे में रहकर काम करना पसंद नहीं करते.

रिको नामके एक स्प्रेयर को ही ले लीजिए, जो पहले गैरकानूनी ढंग से काम करता था लेकिन अब ग्रैफिटी के लिए वैध तरीके अपनाता है. रिको का कहना है, "कुछ एक असामाजिक लेकिन तेज दिमाग वाले लोगों को छोड़ कर ज्यादातर गैरकानूनी स्प्रेयर नई पीढ़ी के हैं. वे उभरते हुए कलाकार हैं जो कड़ी प्रतियोगिता वाले इस युग में गैरकानूनी तरीके अपनाकर अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं. उन्हें सामाजिक क्रांति से कोई लेना देना नहीं है."

म्यूनिख शहर ने स्ट्रीट आर्ट को बढ़ावा देने और शहर को उसके इतिहास से दुबारा जोड़ने का निर्णय लिया है. इसके लिए यहां स्ट्रीट आर्टिस्ट को उनकी कला का प्रदर्शन करने के लिए कानूनी तौर पर कई नई जगहें दी जा रही है. इसके अलावा स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों को एक मंच देने के लिए कई समारोहों का भी आयोजन किया जाएगा. हर साल ऐसी पेंटिंग्स में करीब 80,000 यूरो की कीमत वाले स्प्रे पेंट की खपत होती है. इन पेंट पर भी सब्सिडी दी जाएगी और संग्रहालयों के साथ सहयोग कर इन स्ट्रीट कलाकारों की कला का प्रदर्शन किया जाएगा.

म्यूनिख में ग्रैफिटी दर्शन टूर का आयोजन करने वाले और लेखक मार्टिन आर्स बताते हैं, "इस शहर ने बाकी शहरों की तरह स्ट्रीट आर्ट के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया है." आर्स का मानना है कि यह इस दिशा में पहला कदम होगा. उनका कहना है कि यह पहल इस कला को उन आम लोगों के पास भी लाएगी जो इसे सिर्फ दीवार पर उकेरी गई ऊटपटांग छवि से ज्यादा कुछ नहीं मानते. आर्स कहते हैं कि उत्कृष्ट कला की रचना करने के लिए समय की जरूरत होती है जो गैरकानूनी ढंग से काम करते हुए नहीं हो सकता. उसमें पकड़े जाने का डर लगा रहता है और पकड़े जाने पर भारी जुर्माना भी लगता है.

मगर उन लोगों का क्या होगा, जिन्हें उनके घर या दफ्तर की दीवारों पर बनी ग्रैफिटी को हटाने में जेब हल्की करनी पड़ती है. हर एक वर्ग मीटर से गैरकानूनी तौर पर की गई पेंटिंग को हटाने में औसतन 15 यूरो खर्च होते हैं. जबकि किसी चुनी हुई जगह पर कानूनी तौर पर स्प्रे पेंटिग करवाने में सिर्फ 10 यूरो लगेंगे. शहर के स्थानीय ट्रांसपोर्ट संगठन, एमवीजी स्ट्रीट आर्ट से संपत्ति खराब करने को एक अपराध मानते हैं.

इसी शहर की दीवारों और ट्रेनों पर जर्मनी में सबसे पहले आधुनिक ग्रैफिटी की झलक दिखी थी. कला ने म्यूरल पेंटिंग्स और प्राचीन मिस्र की नक्काशियों से रुप बदलते हुए 1970 के दशक में न्यू यॉर्क में आधुनिक ग्रैफिटी के रूप में जगह पाई. साल 1985 में म्यूनिख के स्प्रेयर कलाकारों ने यहां की एस4 ट्रेन के पूरे कंपार्टमेंट को स्प्रे पेंट कर दिया था. इसे गेल्टेनडॉर्फर ट्रेन के नाम से भी जाना जाता है. लगभग उसी समय म्यूनिख में स्थित यूरोप की सबसे लंबी ऐसी दीवार को मान्यता दी गई जिसपर कानूनी तौर पर स्ट्रीट आर्ट का प्रदर्शन किया गया था.

रिपोर्टः क्रिषा कोप्स/ आरआर

संपादनः आभा मोंढे

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