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दुनिया

म्यूजियम सुधारेगा धारावी की छवि

दुनिया की कुछ बड़ी झुग्गी बस्तियों में से एक, मुंबई का धारावी अब तक नकारात्मक कारणों से ही चर्चा में रहता है. लेकिन अब ‘डिजायन धारावी म्यूजियम’ इलाके की नकारात्मक छवि को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहा है.

Symbolbild Slum

535 एकड़ में फैला स्लम धारावी

ऑस्कर अवार्ड विजेता फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' की वजह से दुनियाभर में धारावी को पहचान तो मिली लेकिन इसके बावजूद उसके सकारात्मक पक्षों की बजाय उसके नकारात्मक पक्षों पर ही चर्चा ज्यादा हुई. धारावी के प्रति लोगों की धारणा बदलने के लिए स्पेन के जॉर्ज रुबियो यहाँ एक मोबाइल म्यूजियम बनाने जा रहे हैं. पेशे से डिजायन आर्टिस्ट जॉर्ज रुबियो के अनुसार यह “यह स्लम में बनाया हुआ दुनिया का पहला म्यूजियम होगा.”

डिजायन धारावी म्यूजियम

तकरीबन तेरह लाख की आबादी वाले इस झुग्गी बस्ती में हजारों छोटे बड़े कारखाने हैं जिसमें कई तरह के उत्पाद बनते हैं. यहां मुख्यतः चमड़ा, हस्त-शिल्प, टेक्सटाइल, ज्वेलरी, फूड प्रोसेसिंग और मिटटी से बने पात्रों की ईकाईयां अधिक हैं. यहां के 10x10 के कमरे में निर्मित वस्तुएं अमेरिका और यूरोप तक निर्यात की जाती है. म्यूजियम में यहां की कलात्मकता के साथ उत्पादकता को बढ़ावा देने की कोशिश की जाएगी. जगह की कमी और ज़्यादा लोगों तक पहुंचने की दृष्टि से “डिजायन धारावी म्यूजियम' एक ट्रेवलिंग या मोबाइल म्यूजियम होगी. धारावी के अलग-अलग इलाकों में इसे आसानी से स्थानांतरित किया जा सकेगा.

Szene aus Slumdog Millionär

स्लमडॉग मिलियनेयर फिल्म का एक सीन

फरवरी के दूसरे पखवाड़े में शुरू होने वाले इस म्यूजियम में धारावी की संस्कृति की झलक भी देखने को मिलेगी. म्यूजियम में वर्कशॉप, सेमिनार और प्रदर्शनी आयोजित की जाएगी. इस मोबाइल म्यूजियम के लिए एक डच फाउंडेशन आर्थिक मदद मुहैया करा रहा है. 2011 में पहली बार धारावी आने वाले जॉर्ज रुबियो को यहां के लोगों की स्वप्रेरणा, उत्साह और उर्जा ने प्रभावित किया था. जॉर्ज रुबियो कहते हैं कि धारावी के लोगों के कार्यों का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया है. धारावी वासियों की प्रतिभा से दुनिया अभी अंजान है. धारावी के असल चित्र को दुनिया के सामने पेश करने के उद्देश्य से ही ‘डिजायन धारावी म्यूजियम' शुरू किया जा रहा है.

प्रिंस चार्ल्स से लेकर राहुल तक

2010 में धारावी का दौरा करने वाले ब्रिटेन के प्रिंस चार्ल्स, जीवन के प्रति यहां के लोगों के दृष्टिकोण से काफी प्रभावित हैं. अपनी किताब हार्मनी में उन्होंने धारावी को पश्चिमी देशों के कई शहरों के मुकाबले ज्यादा व्यवस्थित बताया है. चार्ल्स ने चीजों को रिसाइकल करके उपयोग करने की आदत के लिए भी धारावी को सराहा है.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी धारावी के निवासियों के उद्यमशीलता से अत्यधिक प्रभावित हैं. हाल ही में उन्होंने धारावी में रोड शो किया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से धारावी आने और मेक इन धारावी लागू करने की अपील की. उनके पिता राजीव गांधी ने तीस साल पहले धारावी का दौरा किया था और उसके विकास के लिए 1 अरब रुपये के पैकेज की घोषणा की थी. 'स्लमडॉग मिलेनियर' की सफलता के बाद धारावी विदेशी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है. सैकड़ों विदेशी सैलानी जिज्ञासा वश यहाँ का रुख करते हैं.

Faizal Shekh Mumbai Indien

धारावी के चमड़ा कारोबारी फैजल शेख

अर्थव्यवस्था में योगदान

भले ही धारावी की पहचान गंदी बस्ती के रूप में है लेकिन यह राज्य और देश की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देता है. धारावी के इस अदृश्य योगदान को पहचान दिलाने की कोशिश भी म्यूजियम के माध्यम से की जाएगी. धारावी में रहने वाले लोग इन छोटे घरों से ही अपना व्यवसाय चलाते हैं. समय के साथ यहां जो शिल्प-उद्योग विकसित हुआ है वह देश के लिए विदेशी मुद्रा भी अर्जित कर रहा है. यहां का चमड़ा उद्योग राज्य और देश के लाभदायक रहा है. धारावी के ही 25,000 लोग इसमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं. फैजल शेख बताते हैं कि उनके छोटे से कारखाने में बने चमड़े के बैग दूसरे देशों में भी भेजे जाते हैं. उनका मानना है कि कारोबार बढ़ाने में प्रदर्शनी या सेमिनार फायदेमंद हो सकते हैं.

मिट्टी के सजावटी बर्तन, मूर्तियां-गहने बनाना, बेकरी और कंफेक्शनरी निर्माण समेत लगभग 20,000 छोटे मोटे कारोबार चल रहे हैं. ज्यादातर एक कमरे से ही संचालित होते हैं. एक अनुमान के मुताबिक साल भर में लगभग सौ अरब रुपयों का कारोबार होता है. वैसे तो ‘डिजायन धारावी म्यूजियम' का जोर धारावी की कला-संस्कृति के पक्ष को उभारने में होगा लेकिन उद्योगों को एक मंच पर लाने से उनके बीच साझेदारी-सहयोग को बढ़ावा मिलेगा. जरदोशी-कसीदाकारी किए गए पोशाकों, चमड़े, पॉटरी और प्लास्टिक के सामानों को कला के मंच से जोड़कर व्यापार को फायदा पंहुचाया जा सकता है. जॉर्ज रुबियो की सहयोगी अमान्डा पिनाती कहती हैं कि स्थानीय लोगों के काम को दुनिया के सामने लाएंगे जिसका फायदा यहां के लोगों को मिलेगा.

आसान नहीं है जिंदगी

लगभग 535 एकड़ में फैले हुए धारावी को 1880 के दशक में अंग्रेजों ने गरीब मजदूरों के लिए बसाया था, जो उस समय कारखानों में काम करने के लिए जरूरी थे. बाद में भी अन्य राज्यों से रोजगार की तलाश में मुंबई आए लोग यहां आकर बसते गए. आबादी बढ़ने के कारण यहां कई झुग्गी-झोपडियां खड़ी हो गई है और इन झोपड़ियों का घनत्व इतना बढ़ गया है कि ऊपर से देखने पर इसके आप-पास की जमीन तक नहीं दिखाई देती है. झुग्गियों में रहने वालों का जीवन मुश्किलों और चुनौतियों से भरा हुआ है. दैनिक जरूरतों की चीजों का अभाव झेलते कई लोगों के पास टॉयलेट तक नहीं है.

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