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दुनिया

'म्यांमार की हिंसा अंतरराष्ट्रीय त्रासदी'

भारत दौरे पर आई म्यांमार की विपक्षी नेता आंग सान सू ची ने अपने देश में बौद्ध और मुसलमानों के बीच हिंसा को एक अंतरराष्ट्रीय त्रासदी बताया है. उधर म्यांमार अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा का स्वागत की तैयारी में जुटा है.

सू ची चाहती हैं कि उनके देश में हाल की हिंसा के बाद दोनों समुदाय आपसी शांति के लिए काम करें. जून से लेकर अब तक म्यांमार में एक लाख लोग बेघर हो गए हैं. पश्चिमी राज्य राखीन से रोहिंग्या मूल के हजारों मुस्लिम बांग्लादेश में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं. सू ची कहती हैं कि बौद्ध और रोहिंग्या, दोनों समुदायों ने हिंसा को बढ़ावा दिया इसलिए वह किसी का पक्ष नहीं लेना चाहतीं.

समाचार चैनल एनडीटीवी से बातचीत में सू ची ने कहा,"क्या बांग्लादेश की सीमा को लोग अब भी गैर कानूनी तरीके से पार कर रहे हैं? अगर ऐसा है तो हमें इसे रोकना होगा नहीं तो इस परेशानी का कोई अंत नहीं. बांग्लादेश कहेगा कि यह लोग म्यांमार से आए हैं और म्यांमार के लोग कहते हैं कि यह बांग्लादेश से आते हैं."

हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और मानवाधिकार संगठन नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित सू ची के इस रुख से खुश नहीं है. ऑस्ट्रेलिया के नेशनल यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले निकोलास फैरल कहते हैं कि सू ची रोहिंग्या के पक्ष में इसलिए नहीं बोलना चाहती क्योंकि उनके समर्थक इससे नाराज हो सकते हैं.

म्यांमार के नेताओं का मानना है कि रोहिंग्या समुदाय के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय का समर्थन सही नहीं है और देश के बाहर के लोग हालात को बिलकुल नहीं समझ रहा. म्यांमार में रह रहे आठ लाख रोहिंग्या को सरकार और लोग बांग्लादेश से आए गैर कानूनी प्रवासी के रूप में देखते हैं. उनके खिलाफ म्यांमार के समाज में बहुत सारे पूर्वाग्रह हैं.

बांग्लादेश और म्यांमार, दोनों रोहिंग्या को अपना समुदाय बताने से पीछे हटते हैं. संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि रोहिंग्या समुदाय दुनिया में सबसे ज्यादा भेदभाव का सामना करने वाले समुदायों में से है. 1982 में बने म्यांमार के एक कानून के मुताबिक उन्हें साबित करना होता है कि वे 1823 से पहले से म्यांमार में रह रहे थे, नहीं तो उन्हें नागरिकता नहीं दी जाती. वहीं, सू ची का कहना है कि राखीन में हिंसा को लेकर उनका रवैया साफ है. हिंसा के पक्ष में वह नहीं हैं और जिन्हें नागरिक बनने का हक है उन्हें नागरिकता मिलनी भी चाहिए.

म्यांमार की सरकार ने इस बीच 452 बंदियों को रिहा किया है और कहा है कि 17 नवंबर को राष्ट्रपति ओबामा के पहले म्यांमार दौरे से पहले, वह ऐसा कर रहा है. सू ची सहित नेशनल लीग फॉर डेमॉक्रेसी के नेताओं ने हालांकि इस बात पर दुख जताया है कि रिहा किए गए कैदियों में कोई भी राजनीतिक कैदी शामिल नहीं है. 17 से 20 नवंबर तक अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा म्यांमार, कंबोडिया और थाइलैंड का दौरा करेंगे. म्यांमार को उनकी यात्रा को करीब से देखा जा रहा है लेकिन आलोचकों का कहना है कि शायद ओबामा म्यांमार को लेकर जल्दी कर रहे हैं, क्योंकि वहां की सरकार अब भी मानवाधिकार हनन और हिंसा को रोक नहीं पाई है.

एमजी/एनआर(एएफपी,रॉयटर्स)

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