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दुनिया

मौत से लड़ते बागान मजदूर

भारत की चाय दुनिया भर में मशहूर है. तरोताजा कर देने वाली इस चाय की एक एक पत्ती हाथ से चुनी जाती है. लेकिन जब यह हाथ थक जाते हैं या दूर कर दिये जाते हैं तो जिंदगी यातना में बदल जाती है.

"मैं तो भिखारी बन गया हूं", हताशा से भरे ये शब्द हैं 59 साल के रमेश महाली के जिनका जीवन अब तक चाय के बागान से जुड़ा रहा है. बंगाल के बंदपानी चाय बागान में काम कर वह अपने परिवार का पेट पाला करते थे. लेकिन पिछले साल बागान बंद हो गया. तब से रमेश का परिवार दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहा है.

पत्नी पुलिया की उम्र 50 साल है. माथे की शिकन अब झुर्रियों बदल चुकी है, वह अपनी उम्र से बीस साल ज्यादा बड़ी नजर आती हैं. घर में खाने पीने के लिए सामान ना के ही बराबर है. यही वजह है कि पुलिया कुपोषण की शिकार हो गयी हैं. वह अपनी बाहें तक नहीं हिला सकतीं.

ऐसे में रमेश अपनी पत्नी को अकेला छोड़ कर बाहर नहीं जा सकते. अब तक बहू का थोड़ा सहारा था लेकिन अब वह टीबी की शिकार हो गयी है. परिवार के पास ना खाना खरीदने के पैसे हैं और ना ही इलाज कराने के.

महाली परिवार की दुश्वारी यहां खत्म नहीं होती. बरसात ने झोपड़ीनुमा घर में रहना भी दूभर कर दिया है. सरकार से भी कोई उम्मीद नहीं बची है क्योंकि बागान पर ताले लगने के साल भर बाद अब जा कर राज्य सरकार ने नींद से जगना शुरू किया है. इस बीच बंदपानी और अन्य बागानों में काम करने वाले 69 लोगों की जान जा चुकी है. महाली परिवार की तरह 16,000 लोग गरीबी में दिन काट रहे हैं.

कागजों पर योजनाएं बन चुकी हैं. आपात स्थिति में खाने का सामान और दवा पहुंचाने की बात की गयी है. हर हफ्ते प्रति व्यक्ति दो किलो चावल भी दिए जाने हैं. लेकिन सिर्फ योजना बनाने से पेट थोड़ी ही भरता है. कई लोग घर छोड़ दूसरी जगहों पर नौकरी ढूंढ रहे हैं. गांव छोड़ कर जाने वाले पुरुषों की संख्या बड़ी है और महिलाओं की हालत पुलिया जैसी है जो चल फिर भी नहीं सकतीं. गांव में अभी भी सात हजार लोग रहते हैं.

यह सिलसिला 2006 से चल रहा है जब पश्चिम बंगाल में कई बागानों को बंद कर दिया गया. हालांकि राज्य में जिन बागानों पर अभी ताला नहीं लगा है, वहां भी हालात बेहतर नहीं हैं. करीब दो लाख मजदूर प्रति दिन सौ रुपये से भी कम के भत्ते पर काम कर रहे हैं.

हालांकि असम और केरल के बागानों में ऐसा नहीं है. लेकिन पश्चिम बंगाल के मजदूरों और उनके परिवारों में कुपोषण जैसे आम सी बात हो गयी है. सिलीगुड़ी के करीब एक प्राइमरी स्कूल की टीचर ने भी यह बात मानी कि अधिकतर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.

राज्य में फिलहाल 279 बागान चल रहे हैं. बागान मालिक पैसे की किल्लत की बात करते हैं. कई खुद को दिवालिया घोषित कर चुके हैं. इनमें से कइयों पर मुकदमे चल रहे हैं. ढेकलापाड़ा पिछले 13 साल से कानूनी प्रक्रिया में उलझा है.

कई बागान मालिक फरार हैं या फिर आसपास के इलाकों में होटल चला रहे हैं. बंदपानी के मालिक राकेश श्रीवास्तव इनमें से एक हैं. वह किसी भी तरह के सवालों के जवाब देने के लिए तैयार नहीं और ना ही उनके वकील मीडिया से बात करना चाहते हैं.

इस बीच बंद बागानों के मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गए हैं. पिछले महीने ममता बनर्जी ने इन बागानों का टी ऐक्ट के तहत अधिग्रहण करने की भी बात कही. लेकिन जब तक अदालत या सरकार की ओर से कोई ठोस फैसला नहीं ले लिया जाता, तब तक महाली परिवार जैसे हजारों लोगों की जिंदगियां दांव पर लगी रहेंगी.

रिपोर्ट: ईशा भाटिया (एपी)

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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