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ब्लॉग

मोदी सरकार का आर्थिक सुधारों पर जोर

ब्रिटेन दौरे से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने विदेशी निवेश के नियमों में ढील देने की घोषणा की है. कुलदीप कुमार का कहना है कि सरकार की कोशिश यह दिखाने की है कि वह आर्थिक सुधारों की नीति पर कायम है.

बिहार विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अचानक हरकत में आ गई है और उसने अर्थव्यवस्था के 15 प्रमुख क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) संबंधी नियमों में ढील देने की घोषणा करके यह दर्शाने की कोशिश की है कि वह आर्थिक सुधारों के अपने कार्यक्रम पर अडिग है. देश के विभिन्न हिस्सों में पिछले महीनों में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी के विधायक, सांसद और मंत्री तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अन्य संगठनों के नेता सांप्रदायिकता को भड़काने वाले बयान दे रहे थे और स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार में चुनाव प्रचार करते हुए जैसी बातें कही थीं, उनसे लोगों को लगने लगा था कि सरकार अपने आर्थिक एजेंडे से भटक रही है और ऐसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रही है जिन पर उसे 2014 के लोकसभा चुनाव में जनादेश नहीं मिला था.

लेकिन मंगलवार को देर शाम आर्थिक सुधारों की घोषणा करके मोदी सरकार ने इस आलोचना का जवाब देने की कोशिश की है. इस घोषणा का एक उद्देश्य मोदी की ब्रिटेन यात्रा के ठीक पहले विदेशी निवेशकों को इस बात का भरोसा दिलाना भी है कि वे निश्चिंत होकर भारत की अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में पैसा लगा सकते हैं और सरकार उनके सरोकारों को समझती है.

एफडीआई संबंधी घोषणा से जिन क्षेत्रों को लाभ पहुंचने की उम्मीद की जा रही है उनमें कृषि एवं पशुपालन, वृक्षारोपण, खनन, रक्षा, प्रसारण, नागर उड्डयन, निर्माण विकास क्षेत्र, कैश-एंड-कैरी थोक कारोबार, एकल ब्रांड खुदरा व्यापार, निजी क्षेत्र की बैंकिंग और मैन्यूफेक्चरिंग क्षेत्र. इन क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश संबंधी नियमों तो ढील दी ही गई है, साथ में निवेश की सीमा को भी या तो बहुत अधिक बढ़ा दिया गया है या फिर उसे शत प्रतिशत कर दिया गया है. मसलन विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड अब 3000 करोड़ के बजाय 5000 करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों को सीधे-सीधे मंजूरी दे सकेगा.

सरकार का मानना है कि निवेशकों के लिए यह घोषणा अब तक का सबसे बड़ा तोहफा है. लेकिन इस घोषणा से वाल-मार्ट जैसे मल्टी-ब्रांड खुदरा कारोबार करने वाली विशाल कंपनियों को फिलहाल कोई फायदा नहीं होगा क्योंकि उनके लिए 2012 में निर्धारित सीमा को ही बरकरार रखा गया है. व्यापार एवं उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने सरकार के निर्णय का एक स्वर से स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि इससे आर्थिक सुधारों को गति मिलेगी एवं देश के आर्थिक विकास की रफ्तार में भी तेजी आएगी.

देश में गरीबों के लिए पांच करोड़ मकान बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. आशा की जा रही है कि एफडीआई से भवन निर्माण क्षेत्र को बहुत ताकत मिलेगी और निर्माण की गतिविधियां तेज होंगी. इंजीनियरिंग के क्षेत्र में विदेशी निवेश के साथ-साथ उच्च तकनीकी आने की भी उम्मीद की जा रही है जिसके कारण भारत भविष्य में उच्च तकनीकी उद्योग के क्षेत्र में एक निर्यातक देश के रूप में उभर सकता है. रक्षा के क्षेत्र में भी ऐसी ही आशा की जा रही है.

प्रसारण का क्षेत्र विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक क्षेत्र है. इसमें मनोरंजन एवं सूचना वाले टीवी चैनलों और एफएम रेडियो के लिए निवेश की कोई सीमा नहीं है जबकि खबरों और ताजा हालात पर टिप्पणी आदि से जुड़े चैनलों के लिए निवेश की सीमा भी बढ़ाई गई है. इस सभी कदमों का एक ही लक्ष्य है और वह है भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में तेजी लाने के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करना.

लेकिन वास्तव में क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि विदेशी निवेशक भारत में पैसा लगाने को कितना जोखिमभरा या जोखिमरहित काम समझते हैं. इस समय तो भारत भर में सांप्रदायिक मुद्दों पर हो रही हिंसक घटनाओं के कारण मूडीज जैसी कंपनियां यहां निवेश के लिए आदर्श माहौल नहीं देख पा रहीं. न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे प्रभावशाली अमेरिकी अखबार भी भारत में व्याप्त माहौल पर आलोचनात्मक टिप्पणियां कर रहे हैं. जाहिर है कि सरकार की नींद तोड़ने में इन आलोचनाओं और बिहार में लगे राजनीतिक झटके का भी काफी हाथ है.

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