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ब्लॉग

मोदी के फेरबदल पर चुनावी छाया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में पहली बार जो भारी फेरबदल किया है उस पर चुनावी छाया साफ नजर आती है. दूसरे राजनीतिक दलों की तरह भाजपा ने भी दलबदलुओं को महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपे हैं.

कहने को तो इस फेरबदल का मकसद अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और सुशासन को गति देना है. लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों को यह फेरबदल चुनावी नजर आ रहा है. उन्होंने बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे उन राज्यों को भी प्रतिनिधित्व दिया है जहां जल्दी ही चुनाव होने हैं.

बंगाल

पश्चिम बंगाल उन गिने-चुने राज्यों में है जहां भाजपा मजबूती से पैर जमाते हुए नंबर दो राजनीतिक पार्टी के तौर पर उभरने का प्रयास कर रही है. पिछले लोकसभा चुनावों में उसने बेहतर प्रदर्शन करते हुए राज्य की दो सीटों पर कब्जा कर लिया था. इनमें से दार्जिलिंग सीट पर उसकी जीत को अनदेखा किया जा सकता है. इसकी वजह यह है कि वहां गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन से उसे जीत मिली थी. दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में मोरचा के समर्थन को जीत की गारंटी माना जाता है. उसकी सबसे अहम जीत रही आसनसोल संसदीय सीट पर, जो कई दशकों से सीपीएम के कब्जे में थी. लेकिन गायक से राजनेता बने बाबुल सुप्रियो ने जीवन का पहला चुनाव लड़ते हुए वह सीट जिस तरह छीनी उससे बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों का पूर्वानुमान भी गड़बड़ा गया.

पिछले दिनों हुए विधानसभा उपचुनाव में भी पार्टी ने सीपीएम की एक सीट छीन ली थी. अब उसने वामपंथी दलों को पीछे छोड़ते हुए राज्य में प्रमुख विपक्षी पार्टी बनने की कवायद शुरू कर दी है. इसके साथ ही शारदा चिटफंड घोटाले और बर्दवान बम विस्फोट को मुद्दा बना कर उसे ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है. प्रधानमंत्री ने बाबुल को राज्य मंत्री के पद से नवाजते हुए इस अभियान को और मजबूत करने की दिशा में एक कदम बढ़ा दिया है.

पार्टी के पश्चिम बंगाल प्रभारी व भाजपा के राष्ट्रीय सचिव सिद्धार्थ नाथ सिंह कहते हैं, "बाबुल के केंद्रीय मंत्रिमंडल में आने से इस राज्य में 2016 के विधानसभा चुनाव के पहले सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के 'कुशासन' के खिलाफ लड़ाई में पार्टी को मदद मिलेगी."

पश्चिम बंगाल से बाबुल भाजपा के तीसरे केंद्रीय मंत्री हैं. इससे पहले तपन सिकदर और सत्यब्रत मुखर्जी केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किए गए थे. सिकदर अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पूर्व एनडीए की सरकार में 1999 से 2004 तक केंद्रीय मंत्री थे, जबकि मुखर्जी 2000 से 2004 तक केंद्रीय मंत्री थे. राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो वर्ष 2016 में होने वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए भाजपा ने अभी से कमर कसते हुए तृणमूल कांग्रेस सरकार को करारी शिकस्त देने के लिए तैयारी शुरू कर दी है. राज्य में अगले साल ही कोलकाता नगर निगम के चुनाव होने हैं. इसे मिनी विधानसभा चुनाव कहा जाता है. बाबुल को नगर विकास राज्य मंत्री बनाया गया है. ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं है कि अपने पांव जमाने की कवायद के तहत पार्टी विकास के कार्ड का इस्तेमाल करना चाहती है.

बाकी राज्य

दिल्ली और बिहार जैसे चुनाव के नजदीक खड़े राज्यों में भी विस्तार के समय मोदी ने जातीय व राजनीतिक समीकरणों को साधने की कोशिश की है. दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने जाटों को लुभाने की भी कोशिश की है. मंत्रिमंडल के पहले विस्तार में मोदी ने संघ और अपनी निजी पसंद के साथ-साथ सामाजिक संतुलन का भी ध्यान रखा है. लेकिन दलबदलुओं को महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंप कर यह साबित कर दिया कि भाजपा भी दूसरे राजनीतिक दलों के मुकाबले अलग नहीं है. यह सही है कि उन्होंने कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के मुकाबले बेहतर सोशल इंजीनियरिंग का परिचय दिया है. फिर भी उनका यह विस्तार आरोपों और विवादों से नहीं बच सका है. शिवसेना छोड़ कर आने वाले सुरेश प्रभु को रेलवे जैसा अहम मंत्रालय सौंपना एक मिसाल भर है. उन्होंने विस्तार में उत्तर प्रदेश को खासी तवज्जो दी है. 80 में 73 सीटें जिताने वाले इस प्रदेश को देर-सबेर इसका इनाम मिलना तो तय ही था. इसके अलावा इस विस्तार में पर्यवेक्षकों को कोई खास बात नजर नहीं आती. चार-पांच महीने के भीतर कई प्रमुख मंत्रियों का विभाग बदलने की भी कोई ठोस वजह नहीं नजर आ रही है. यह फेरबदल देश की अर्थव्यवस्था को किस हद तक पटरी पर ला पाएगा, यह तो बाद में पता चलेगा. फिलहाल तो विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को मजबूती प्रदान करना ही इसका अकेला मकसद नजर आ रहा है.

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