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ब्लॉग

मोदी की रूस यात्रा से क्या हैं उम्मीदें

नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा का फोकस मुख्य रूप से आर्थिक और रक्षा क्षेत्र में सहयोग संबंध को और अधिक मजबूत बनाने पर रहेगा. कुलदीप कुमार के मुताबिक दोनों देश बदलती दुनिया की हकीकत समझते हुए दोस्ती को नए स्तर पर ले जाएंगे.

सोवियत संघ के विघटन के बाद कुछ वर्षों तक भारत और रूस के संबंधों में बहुत कम रफ्तार से प्रगति हुई लेकिन अब फिर से उनमें पुरानी ऊष्मा लौट आई है. यूं भी रूस की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था के लिए रक्षा उपकरणों का निर्यात बेहद महत्वपूर्ण बन चुका है और भारत इस समय विश्व के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में से एक है. उधर रूस तेल और प्राकृतिक गैस के मामले में बहुत समृद्ध है और भारत इस मामले में उसके साथ आपसी हितों पर आधारित संबंध बनाना चाहता है. पूरी दुनिया में अमेरिका और चीन के बाद भारत तेल और गैस का सबसे अधिक आयात करता है और उसकी अर्थव्यवस्था इस आयात पर बहुत कुछ निर्भर करती है. आतंकवाद का शिकार होने के कारण भारत की दिलचस्पी सीरिया की स्थिति और उसमें रूस की भूमिका में भी है. प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के दौरान इन सभी मसलों पर सार्थक संवाद और प्रगति होने की उम्मीद की जा रही है.

रक्षा सौदे

यात्रा शुरू होने से एक दिन पहले ही केंद्रीय मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति ने रूस के साथ दो सौदों को स्वीकृति दी है और इन पर मोदी की रूस यात्रा के दौरान हस्ताक्षर किए जाने की संभावना है. भारत रूस से एक और परमाणु पनडुब्बी लीज पर लेने की संभावना की पड़ताल कर रहा है. वह रूस से 40,000 करोड़ रुपये की लागत पर वायु प्रतिरक्षा मिसाइल प्रणाली भी खरीदने का फैसला कर चुका है. उधर रूस ने 7 अरब डॉलर की जगह 3.7 अरब डॉलर की कीमत पर ही उसे सुखोई टी-50 लड़ाकू जेट बेचने की आकर्षक पेशकश की है लेकिन ऐसी खबर है कि भारतीय वायुसेना अभी भी इसे महंगा सौदा मान रही है और उसे इस लड़ाकू जेट की क्षमताओं पर भी पूरा भरोसा नहीं है. लेकिन बहुत संभव है कि मोदी इस मामले में राजनीतिक दृष्टि से कोई फैसला ले लें. इस समय रूस पर अमेरिका और पश्चिमी देशों ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए हुए हैं और तेल के दामों में भी गिरावट आई हुई है. इन दोनों के कारण उसकी अर्थव्यवस्था के लिए यह काफी मुश्किल समय है. ऐसे में भारत द्वारा रक्षा उपकरणों की खरीद उसके लिए बहुत महत्व रखती है.

आर्थिक सहयोग

मोदी की यात्रा के दौरान दोनों देशों की प्रमुख कंपनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी भी आपस में बैठक करेंगे और इस बात पर विचार करेंगे कि वर्तमान 10 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार को अगले दस वर्षों के भीतर कैसे तीन गुना किया जाए. विदेश सचिव एस जयशंकर ने कहा है कि भारत को उम्मीद है कि विविध क्षेत्रों में अनेक समझौतों पर हस्ताक्षर किए जाएंगे. अनुमान लगाया जा रहा है कि इन क्षेत्रों में परमाणु, रक्षा, व्यापार और पर्यटन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा. भारत यूरेशियन आर्थिक क्षेत्र के साथ मुक्त व्यापार समझौता करने में भी काफी दिलचस्पी ले रहा है और बहुत संभव है कि मोदी की दो-दिवसीय रूस यात्रा के दौरान इस संबंध में किए गए एक अध्ययन का ब्यौरा भी साझा किया जाए.

नए दौर में पुराने दोस्त

भारत और रूस के बीच प्रतिवर्ष शिखर सम्मेलन होता है क्योंकि दोनों ही एक-दूसरे को रणनीतिक साझीदार मान चुके हैं. पहले माना जा रहा था कि सोवियत संघ के विघटन के बाद शीत युद्ध की समाप्ति हो गई है लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान रूस और अमेरिका के नेतृत्व वाले पश्चिमी देशों के खेमे के बीच एक नए शीत युद्ध की शुरुआत हो चुकी है. हालांकि भारत इस दौरान अमेरिका के काफी नजदीक आया है, लेकिन भूराजनैतिक दृष्टि से आज भी उसे रूस की मदद की जरूरत पड़ सकती है क्योंकि अमेरिका का पाकिस्तान और उसके द्वारा प्रायोजित भारतविरोधी आतंकवाद के प्रति कोई स्पष्ट नजरिया विकसित नहीं हो पाया है. इस दृष्टि से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा का महत्व स्वतः स्पष्ट है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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