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ब्लॉग

मोदी की राह आसान नहीं

नरेंद्र मोदी के नाम पर बीजेपी का जनता दल(यू) के साथ 17 साल पुराना गठजोड़ खत्म हो गया. एनडीए में टूट के साथ ही लोकसभा चुनाव से पहले नए राजनीतिक समीकरणों और गठबंधनों के बनने का रास्ता खुल गया है.

बिहार विधानसभा में विश्वास मत हासिल करके मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सिद्ध कर दिया कि भाजपा के सरकार से बाहर जाने के बावजूद वे जनता दल(यू) की सरकार बखूबी चला सकते हैं. अब बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में उसके अलावा केवल दो ही दल बचे हैं, शिरोमणि अकाली दल(बादल) और शिव सेना.

नरेंद्र मोदी को अभी केवल बीजेपी की चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाया गया है, लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत द्वारा उनकी प्रशंसा किए जाने और देश की समस्याओं के समाधान के लिए हिन्दुत्व की आवश्यकता बताए जाने के बाद किसी को भी शंका नहीं रह गई है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में मोदी ही बीजेपी और उसके नेतृत्व वाले गठबंधन के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे. मोदी के प्रभाव का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके मुद्दे पर बीजेपी बिहार सरकार में अपनी भागीदारी और जनता दल(यू) के साथ 17 साल पुराने रिश्ते को दांव पर लगाने से नहीं हिचकिचाई यही नहीं, उसने अपने वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी की कोई परवाह नहीं की. (बीजेपी में अटल आडवाणी युग खत्म)

2002 की गुजरात हिंसा के घाव अभी तक भरे नहीं हैं क्योंकि वहां अभी तक इन दंगों में विस्थापित लोग राहत शिविरों में बेहद खराब हालात में रहने को अभिशप्त हैं. मोदी का व्यक्तित्व देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाला माना जाता है, लेकिन संभवतः इसी कारण भाजपा का पारंपरिक जनाधार उन्हें समर्थन दे रहा है. गुजरात में आर्थिक विकास को औद्योगिक और कारोबारी जगत द्वारा मिली प्रशंसा और स्वयं मोदी की प्रचार मशीनरी के सफल प्रयासों के कारण युवा वर्ग भी उनकी ओर जा रहा है और उसे लग रहा है कि आर्थिक समृद्धि की ओर बढ़ने की उसकी आकांक्षाओं को मोदी जैसा तेज-तर्रार, प्रशासन में कुशल और त्वरित निर्णय लेने वाला अपेक्षाकृत युवा नेता ही पूरी कर सकता है. लेकिन ये युवा अधिकतर बड़े शहरों में रहने वाले मध्यवर्ग तक ही सीमित हैं. यह जगजाहिर बात है कि शहरी मध्यवर्ग मतदान में उस उत्साह से भाग नहीं लेता जिस उत्साह से ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बूढ़े और जवान मतदाता भाग लेते हैं. अभी तक इस बात का कोई संकेत नहीं मिला है कि ग्रामीण इलाकों में, जहां देश के दो-तिहाई मतदाता रहते हैं, नरेंद्र मोदी की किस तरह की छवि बनी है और उनके प्रति मतदाताओं में कितना उत्साह है. हालांकि बीजेपी ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में पेश करने का मन बना लिया है, लेकिन उनकी व्यक्तिवादी और अलोकतांत्रिक कार्यशैली के कारण पार्टी के अनेक नेता दिल से उन्हें नहीं चाहते॰ गुजरात में पार्टी के दूसरे नेता पिछले वर्षों में लगातार अप्रासंगिक होते गए हैं और हाशिये पर धकेले जा चुके हैं॰

उधर उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक संघीय मोर्चे के निर्माण के लिए प्रयास करने के संकेत दे रहे हैं जो कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बना कर चले. लेकिन इस प्रकार के मोर्चे के बनने की संभावना काफी कमजोर लग रही है क्योंकि एक प्रभावी मोर्चा होने के लिए उसे सभी गैर-कांग्रेस, गैर-बीजेपी दलों के सहयोग की आवश्यकता होगी लेकिन क्षेत्रीय राजनीति के चलते उसमें सामाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में से एक और डीएमके और एआईएडीएमके में से एक पार्टी ही शामिल हो सकती है. इसी तरह उसमें यदि ममता बनर्जी शामिल होती हैं तो वाम दलों के शामिल होने की संभावना समाप्त हो जाती है. इसलिए यदि इस तरह का कोई मोर्चा बना भी, तो वह गैर-कांग्रेस, गैर-भाजपा सरकार बनाने में सक्षम नहीं हो सकेगा. अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि जनता दल(यू) और कांग्रेस के बीच किस प्रकार का संबंध बनेगा. बिहार को विशेष पैकेज आदि देकर कांग्रेस नीतीश कुमार को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही है और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें ‘सेक्यूलर' बताकर इस कोशिश को बल दिया है. विपक्षी मोर्चे के गठन के मुद्दे पर वाम दलों का रुख भी अभी तक साफ नहीं है. इसलिए जहां यह सही है कि राजग के टूटने से नई समीकरणों के बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ है, वहीं यह भी सही है कि इन समीकरणों का स्वरूप अभी उभर कर सामने आना बाकी है॰

उधर नरेंद्र मोदी अपनी सांप्रदायिक छवि को धो-पोंछकर साफ करने की कोशिश में लगे हैं. इसी कोशिश के तहत उन्होने अयोध्या जाकर वहां रामलला के दर्शन करने का विश्व हिन्दू परिषद का निमंत्रण ठुकरा दिया है. कुछ समय पहले उन्होंने गुजरात में सद्भावना यात्रा निकाल कर मुस्लिम समुदाय में विश्वास पैदा करने और उसका समर्थन प्राप्त करने की असफल सी कोशिश की थी. वर्तमान स्वरूप में एनडीए सत्ता में आने का स्वप्न नहीं देख सकता. उसके लिए उसे अन्य पार्टियों को अपनी ओर खींचना करना होगा. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद क्या ऐसा हो सकेगा? आने वाले कुछ महीनों में इस बारे में संकेत मिलने शुरू हो जाएंगे॰

ब्लॉगः कुलदीप कुमार, दिल्ली

संपादनः निखिल रंजन

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