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ब्लॉग

मोदी की कैबिनेट: काम कम, सरकार ज्यादा

छोटी सरकार का वादा करके सत्ता में आने वाले नरेंद्र मोदी ने दो साल में ही अपनी सरकार पिछली सरकार जितनी बड़ी कर ली है. हालांकि वे मनमोहन सिंह सरकार के विशालकाय होने की हमेशा आलोचना किया करते थे.

प्रधानमंत्री बनने से पहले और बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने देश की जनता से वादा किया था कि उनकी सरकार छोटी होगी लेकिन उसके काम बड़े होंगे. "मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस"(न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन) उनका नारा था. उन्होंने इसके अलावा भी अनेक अन्य वादे किए थे जिन्हें उनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने "चुनावी जुमला" कह कर हवा में उड़ा दिया. अब सत्ता में आने के दो साल बाद नरेंद्र मोदी छोटी सरकार के जरिये बड़े कामों को अंजाम देने के अपने वादे को भी एक "जुमला" सिद्ध कर रहे हैं. अभी तक उनकी सरकार में 66 मंत्री थे. आज उन्होंने 19 नए मंत्री शामिल करके अपनी मंत्रिपरिषद का विस्तार किया है. पांच मंत्रियों ने इस्तीफा दिया है और इस समय मोदी सरकार में 78 मंत्री हैं. यहां यह याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में भी 78 मंत्री थे. यानी छोटी सरकार का वादा करके सत्ता में आने वाले नरेंद्र मोदी ने दो साल में ही अपनी सरकार पिछली सरकार जितनी बड़ी कर ली है. हालांकि वे मनमोहन सिंह सरकार के विशालकाय होने की हमेशा आलोचना किया करते थे.

चुनावी दृष्टि से की गई सामाजिक इंजीनियरिंग

नए मंत्रियों की सूची पर नजर डालने से स्पष्ट हो जाता है कि हमेशा चुनावी मूड और मोड में रहने वाले मोदी ने मंत्रिपरिषद का विस्तार भी अगले साल उत्तर प्रदेश और गुजरात में होने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर किया है. इसीलिए लोगों को उनके प्रशासनिक या राजनीतिक अनुभव के आधार पर नहीं बल्कि जातीय समीकरण के आधार पर मंत्री बनाया गया है. यानी मंत्रिपरिषद के गठन में चुनावी सरोकार हावी रहे हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो यह चुनावी दृष्टि से की गई सामाजिक इंजीनियरिंग है. पिछले कुछ समय से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश का दौरा करके पिछड़े वर्ग, खासकर कुर्मी जाति के लोगों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करते रहे हैं. इसीलिए आज कुर्मी नेता अनुप्रिया पटेल को मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया है.

मोदी की फिल्म में मोदी ही हीरो

बहुत कम लोगों ने उत्तराखंड के अजय टम्टा या उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर की कृष्णा राज का नाम सुना होगा. मध्य प्रदेश के फग्गन सिंह कुलस्ते का नाम जरूर कुछ जाना-पहचाना है क्योंकि 2008 में जो वोट-के-लिए-नोट कांड हुआ था, उसमें वह भी एक आरोपी थे. इसी तरह उत्तर प्रदेश के महेंद्र नाथ पाण्डेय हों या राजस्थान के अर्जुन राम मेघवाल, इनके राजनीतिक कद या किसी अन्य योग्यता के बारे में किसी को कुछ खास पता नहीं है. इससे लोगों की यह आशंका ही पुष्ट होती है कि मोदी सरकार में केवल मोदी ही महत्वपूर्ण हैं, शेष सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए हैं. यानी उनकी फिल्म में केवल वे ही हीरो होते हैं, शेष सब एक्सट्रा. उनकी सरकार में जो मंत्री महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल रहे हैं और जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर कद्दावर नेता की छवि बहुत पहले बन गई थी, वे भी कमोबेश शोभा की वस्तु बन कर रह गए हैं. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हों या गृह मंत्री राजनाथ सिंह, किसी की भी अपने मंत्रालय पर पकड़ नहीं है.

सत्ता का केंद्रीकरण

नरेंद्र मोदी की कार्यशैली संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था के तहत चलने वाली कैबिनेट प्रणाली के बजाय राष्ट्रपति प्रणाली के अधिक नजदीक दिखायी देती है. यह एक सर्वविदित बात है कि उनके कार्यकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय में सत्ता का जिस सीमा तक केंद्रीकरण हुआ है, उस सीमा तक पहले कभी नहीं हुआ था. हालांकि यह सही है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में सत्ता सिमटते जाने का सिलसिला इंदिरा गांधी के कार्यकाल में ही शुरू हो गया था. विदेश नीति समेत अनेक मोर्चों पर मोदी सरकार को मिल रही नाकामयाबी के पीछे विश्लेषक इस कार्यशैली को भी सबसे प्रमुख कारण मानते हैं.

इस पृष्ठभूमि में आज मंत्रिपरिषद में हुआ विस्तार कोई बहुत महत्वपूर्ण घटना नहीं लगता. यदि इसका महत्व है तो वह अगले साल आने वाले चुनावों की दृष्टि से ही है. इसलिए नहीं है कि यह विस्तार सरकार की गुणवत्ता या कार्यक्षमता में बढ़ोतरी करेगा.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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