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दुनिया

मोदित्व के सामने मुश्किल में कांग्रेस

नरेन्द्र मोदी की सरकार पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गुजरात में पिछड़े अल्पसंख्यक और कुपोषित महिलाएं दिखाईं. मंगलवार को चुनाव प्रचार का आखिरी दिन है और दोनों पार्टियां हमले का कोई मौका नहीं गंवा रही.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि गुजरात को बंटवारे की राजनीति से मुक्त करवाने का समय आ गया है. साथ ही उन्होंने दुख भी जताया कि इस राज्य में अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. "विपक्ष के उलट हम ऐसी कोई राजनीति नहीं करते जो लोगों को बांटती हो. इस तरह की राजनीति अपने आप में ही बुरी होती है और लंबे समय के लिए यह राजनीतिक पार्टी के लिए फायदेमंद नहीं है. प्रधानमंत्री गुजरात जिले के नवसारी में अपना पहला चुनावी भाषण दे रहे थे. उन्होंने कहा, "अब समय आ गया है कि गुजरात खुद को इस तरह की राजनीति से मुक्त करवाए और उन लोगों को फिर से सत्ता में न आने दे जो वोट लेने के लिए समाज को बांटते हैं. कांग्रेस ने हमेशा देश के लोगों को एक करने का काम किया है. हम जानते हैं कि अगर धर्म, जाति, समाज, कुल के नाम पर अगर लोग बंटे हों तो देश के तौर पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता. हमारे पास लगातार शिकायतें आ रही हैं कि समाज में अल्पसंख्यक और दूसरे धड़ों के कुछ लोग असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. कुछ सरकारी अधिकारियों ने भी इस तरह की शिकायत की है. यह हमारे देश के लिए दुखद है कि महात्मा गांधी के राज्य में ऐसा माहौल है."

रिटेल सेक्टर में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देश में आने की अनुमति देने वाले, टेलिकॉम, कॉमनवेल्थ, कोयला घोटाले के आरोपों में घिरी सरकार के प्रमुख ने कहा, गुजरात में विकास कुछ ही लोगों के लिए है. आर्थिक विकास से अधिकतर जनसंख्या को कोई लाभ नहीं हुआ. क्योंकि राज्य सरकार की नीतियों के कारण समाज में असमानता है."

भारत में आर्थिक सुधारों की नींव रखने वाले जाने माने अर्थशास्त्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को चुनाव से तीन दिन पहले याद आया है, "गुजरात जैसे एक विकसित राज्य में बहुत ही दुखद स्थिति है कि 41 फीसदी महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं. अगर आप 15 से 20 साल की महिलाओं को देखें तो उनमें से आधी को खून की कमी है. मैं आपका ध्यान खींचना चाहूंगा कि अगर हम 20 राज्यों को मानव संसाधन के सूचकांक पर रखें तो मानव विकास के मामले में गुजरात 18वां है. गुजरात ग्रामीण इलाकों में रोजगार बढ़ाने के केंद्रीय कोष को खर्च नहीं कर सका है. यहां बेरोजगार युवकों के लिए कोई मौके नहीं हैं."

राष्ट्रीय स्तर पर जहां भारतीय जनता पार्टी अपने हिंदूवादी एजेंडे से जूझ रही है वहीं उसने यह भी निश्चित ही महसूस किया होगा कि जिस राज्य में उसके प्रशासन के दौरान कुछ काम हुआ है वहां भारतीय जनता पार्टी सत्ता में रही है. गुजरात के अलावा मध्यप्रदेश इसका उदाहरण है. ऐसा ही उदाहरण नरेन्द्र मोदी का भी है. विकास के नाम पर वह आज भी गुजरात के अकेले नेता बने हुए हैं. अधिकतर लोगों को इसमें शंका नहीं है कि मोदी चौथी बार भी मुख्यमंत्री बनेंगे हालांकि यह साफ नहीं है कि क्या उन्हें इतने मत मिल जाएंगे कि पार्टी उन्हें 2014 के चुनावों में प्रधानमंत्री पद के लिए खड़ा कर दे.

बीजेपी का दावा है कि देश के मतदाता ऐसे नेता को निश्चित चुनेंगे जिन्होंने गुजरात को सतत बिजली, अच्छे रास्ते और निवेश की नई दिशाएं दिखाई हालांकि बिहार में यही काम काफी हद तक नीतिश भी कर रहे हैं. हालांकि मोदी के पोल पोजिशन पर होने से बीजेपी को 2014 में निश्चित ही फायदा होगा.

आलोचक नरेन्द्र मोदी को प्रतिशोध लेने वाला और अधिकारवादी नेता बताते हैं. इनमें से सबसे कड़वी यादें गुजरात दंगों की हैं. लंदन यूनिवर्सिटी में कॉमनवेल्थ स्टडीज के प्रोफेसर जेम्स मैनर कहते हैं,"वो गुजरात से बाहर ज्यादा मतदाताओं को रोमांचित नहीं करते. वह इसकी बजाए उन्हें डराते हैं." गुजरात में पहले दौर का चुनाव 13 और दूसरे दौर का 17 दिसंबर को होना है. इंडिया टुडे का नवंबर का सर्वे कहता है बीजेपी को पांच साल पहले की तुलना में ज्यादा सीटें मिलेंगी.

गुजरात में मोदी का रिकॉर्ड अच्छा है, टॉप गर्वनेंस, नौकरी के अच्छे मौके, ज्यादा और सस्ते घर, स्वास्थ्य सेवा का वादा. मोदी की जीत बीजेपी के लिए दुधारी तलवार साबित होगी. अधिकतर भारतीयों ने उन्हें गुजरात दंगों के लिए माफ नहीं किया है. आलोचक उन्हें जानबूझकर दंगे काबू नहीं करने का जिम्मेदार ठहराते हैं. भारत के बाहर उन्हें अभी भी संदेह की नजरों से देखा जाता है. ब्रिटेन ने मोदी के साथ कूटनीतिक संबंध अक्टूबर में फिर से बना लिए हैं लेकिन अमेरिका सहित कई देश अभी भी उनसे दूरी बनाए हैं. हालांकि अमेरिका में विकास के नाम पर मोदी की तारीफ भी की गई.

राजनीतिक विश्लेषक परंजॉय गुहा ठाकुरता कहते हैं, "जब तक वो जिएंगे तब तक उन्हें 2002 का जनसंहार तंग करता रहेगा. " भारतीय जनता पार्टी के लिए मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना खतरे से खाली भी नहीं होगा. और इससे उत्तरप्रदेश, बिहार में पैर जमाने में उसे मुश्किल भी होगी. सबसे बुरा होगा कि राष्ट्रीय सरकार बनाने के लिए उसे मिलने वाला सहयोग कम हो जाएगा. मोदी की ही तरह ताकतकवर नीतीश कुमार मोदी के नेतृत्व को शायद समर्थन न दें. यूरेशिया ग्रुप की विश्लेषक अंजलिका बरदालाई कहती हैं कि 2014 का चुनाव कांग्रेस, बीजेपी और क्षेत्रीय दलों के बीच बंटेगा, "ऐसी स्थति में बीजेपी की दूसरी पार्टियों के साथ गठबंधन बनाने की क्षमता निर्भर करेगी कि वह कितना अच्छा प्रशासन कर सकती है. "

रिपोर्टः आभा मोंढे (पीटीआई, रॉयटर्स)

संपादनः एन रंजन

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