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ब्लॉग

मैला ढोने की त्रासदी

भारत के संविधान में छुआछूत गैरकानूनी होने के बाद भी देश के अनेक हिस्सों में चला आ रहा है. इसकी जड़ें हजारों साल से चली आ रही जातिव्यवस्था में हैं.

शहरों में रहने वालों के बीच तो सामाजिक व्यवहार में जाति व्यवस्था की जकड़न कुछ ढीली हुई है, लेकिन गांवों में उसकी गिरफ्त अभी भी बहुत मजबूत है. कुछ जातियां पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही पेशा अपनाने पर मजबूर हैं क्योंकि ग्रामीण समाज की संरचना में उन्हें सामाजिक गतिशीलता से वंचित रखा गया है. निचली समझी जाने वाली जातियों के खिलाफ प्रभुत्वशाली ऊंची जातियों की हिंसा, भेदभाव और आर्थिक-सामाजिक उत्पीड़न जातिव्यवस्था और गांव के आर्थिक ढांचे के साथ जुड़े हुए हैं. अछूत समझी जाने वाली जातियों के जिम्मे दूसरी जातियों के घरों की सफाई करने और वहां से कूड़ा-कर्कट और मलमूत्र उठाकर अपने सिर पर ढोकर ले जाने का काम सौंप दिया गया है और उनकी स्थानीय सत्ता प्रतिष्ठान में किसी भी प्रकार की भागीदारी नहीं है. इस प्रकार आबादी के एक बड़े हिस्से को स्थायी रूप से वंचित बना दिया गया है. आज जब विज्ञान और तकनीकी का इतना विकास हो चुका है, तब भी देश के बड़े हिस्से में यही व्यवस्था लागू है, वह भी तब जब स्वाधीनता संघर्ष के दिनों में महात्मा गांधी ने और पिछले दिनों प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस प्रथा को देश के लिए “शर्म” बताया है॰

अब संसद ने इस स्थिति को बदलने की दिशा में एक पहल की है और पिछली सात सितंबर को एक कानून बनाकर हाथ से मैला साफ करने और उसे सिर पर ढोकर ले जाने को प्रतिबंधित कर दिया है. इस काम में लगे कर्मचारियों के पुनर्वास के लिए प्रावधान भी तैयार किए गए हैं॰ पिछले कई वर्षों से नागरिक समाज में सक्रिय संगठन, मसलन नवसृजन, सफाई कर्मचारी आंदोलन और राष्ट्रीय गरिमा अभियान, यह मांग उठा रहे थे कि इस अमानवीय प्रथा को समाप्त किया जाए. कानून तो बन गया है लेकिन अब वास्तविक चुनौती उसे प्रभावी ढंग से लागू कराने की है क्योंकि कानून बनने और उस पर अमल होने में बहुत अंतर है. अब इन और इन जैसे अन्य सभी संगठनों पर यह जिम्मेदारी आ गई है कि वे इस कानून को लागू कराने के लिए अपना संघर्ष और आंदोलन जारी रखें ताकि प्रशासन पर जनमत का दबाव बना रहे. 

इस कानून में प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति किसी को हाथ से मैला साफ करने और ढोने के लिए नौकरी पर रखेगा, तो उसे इसके लिए पाँच साल कैद तक की सजा दी जा सकती है. इस कानून के उल्लंघन को ऐसा अपराध माना गया है जिसका राज्य को संज्ञान लेना होगा और जिसमें जमानत भी नहीं मिल सकेगी. अभी तक जो लोग इस काम में लगे थे, उन्हें और उनके परिवारों को वैकल्पिक रोजगार देना भी अब सरकार के लिए कानूनी बाध्यता होगी. हर मकान मालिक की जिम्मेदारी होगी कि वह अपने मकान में ऐसा शौचालय ढहा दे जिसमें मलमूत्र को हाथ से साफ करने की जरूरत हो और उसके स्थान पर नए किस्म का शौचालय बनवाए जिसे हाथ से साफ न करना पड़े. यदि वह स्वयं ऐसा नहीं करता तो स्थानीय प्रशासन को अधिकार होगा कि वह ऐसे शौचालय को या तो ढहा दे या फिर नए किस्म के शौचालय में तब्दील करवाए और इस काम पर आने वाले लागत की रकम मकान मालिक से वसूल करे. स्थानीय प्रशासन की यह जिम्मेदारी भी होगी कि वह नियमित रूप से अपने इलाके में सर्वेक्षण कराकर पता लगाता रहे कि किस मकान में प्रतिबंधित श्रेणी का शौचालय है. केन्द्रीय सामाजिक न्याय मंत्री कुमारी शैलजा ने संसद में स्वीकार किया कि 1993 में बना कानून प्रभावी नहीं हो पाया जिसके कारण नया कानून बनाने की जरूरत महसूस की गई. उन्होंने स्पष्ट किया कि हाथ से साफ किए जाने वाले शौचालयों के दिन अब लद गए हैं.

सफाई की समस्या एक राष्ट्रीय समस्या है और जनता के स्वास्थ्य के लिए भी एक बहुत बड़ी चुनौती है॰ खुले में मलमूत्र विसर्जन करने के कारण बीमारियां फैलने का खतरा तो है ही, यदि हाल ही में सामने आए अध्ययनों के निष्कर्षों को मानें तो वायुमंडल में फैले मल-कणों के कारण बच्चों और किशोरों के विकास पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है और इसीलिए भारत में औसत कद छोटा पाया जाता है. इस दिशा में भारतीय रेल को भी विशेष प्रयास करना होगा और रेल के डिब्बों में ऐसे शौचालय बनाने होंगे जिनसे मलमूत्र का विसर्जन बाहर की ओर न हो. अभी स्थिति यह है कि वह रेल की पटरी के बीच में गिरता जाता है. डिब्बों में ऐसे शौचालय होने चाहिएं जिन्हें गंतव्य स्थान पर पहुंचने के बाद यंत्रों की मदद से साफ किया जा सके॰ नया कानून दलित अधिकारों, बल्कि यूं कहें कि मानावाधिकारों के विस्तार की दिशा में एक सार्थक पहल कहा जा सकता है॰

ब्लॉग: कुलदीप कुमार, नई दिल्ली

संपादन: निखिल रंजन

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