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दुनिया

मैरी मैककिलोप को संत का दर्जा

पोप बेनेडिक्ट सोलहवें ने ऑस्ट्रेलिया की मैरी मैककिलोप को संत का दर्जा दिया है. ऑस्ट्रेलिया से पहली संत मैककिलोप ने शिक्षा के जरिए हजारों जिंदगियों को सहारा दिया और पादरियों के बाल यौन शोषण पर चर्च से टकराव भी मोल लिया.

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मैककिलोप ने ऑस्ट्रेलिया मुश्किल औपनिवेशिक दौर में गरीब और जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल और घर कायम किए. वेटिकन में हजारों लोगों के सामने पोप ने कहा, "युवावस्था से ही उन्होंने अपना जीवन जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा को समर्पित कर दिया और ऑस्ट्रेलिया के देहाती इलाकों में रहने वालों के लिए अधिकारियों की मांग की. पूरे ऑस्ट्रेलिया में बरसों से इस शिक्षा से बेशुमार युवा लोगों का जीवन संवर रहा है. मदर मैरी मैककिलोप के संतों जैसे उत्साह और साहस से ही प्रेरित होकर बहुत से अध्यापकों ने भी गरीब बच्चों को शिक्षित करने में योगदान दिया."

मैरी मैककिलोप के जीवन में ऐसा भी समय आया जब उन्हें अलग थलग कर दिया गया. इस की एक वजह चर्च में बाल यौन शोषण का मुद्दा था, जिसकी आजकल भी खूब चर्चा हो रही है. इस मुद्दे पर पोप पियुस नौवें का समर्थन मिलने से पहले उन्हें चर्च से टकराना पड़ा.

अपने साहस और दृढ़ संकल्प के लिए पहचानी जाने वाली मैककिलोप को ऑस्ट्रेलिया में "जनता का संत" कहा जा रहा है, जहां उन्हें संत का दर्जा दिए जाने का बेसब्री से इंतजार हो रहा था. ऑस्ट्रेलियाई कैथोलिक बिशप कांफ्रेस के अध्यक्ष आर्कबिशप फिलिप विल्सन कहते हैं, "वह हम में से ही एक थीं. मैरी एक आम इंसान थीं जिन्होंने पवित्र जीवन बिताया."

Papst Vatikan Heiligsprechung

मैरी हेलेन मैककिलोप का जन्म 1842 में मेलबर्न में एक स्टॉटिश परिवार में हुआ. वह आठ संतानों में सबसे बड़ी थीं. पैसे की कमी के कारण उनके परिवार को अकसर बेघर होना पड़ता था. 16 साल की उम्र से ही मैककिलोप ने अध्यापिका के तौर पर काम करना शुरू कर दिया ताकि परिवार को सहारा दिया जा सके. एक स्थानीय पादरी से प्रेरित होकर उन्होंने 1866 में पेनोला शहर के पास बेकार पड़े एक अस्तबल में पहला सेंट जोसेफ स्कूल खोला. जब अन्य युवतियां भी उनके साथ आई तो मैककिलोप ने सिसटर्स ऑफ सेंट जोसेफ नाम की संस्था बनाई. जल्द ही उन्हें एडीलेड में स्कूल खोलने को कहा गया जहां उन्होंने महिला आश्रम और अनाथ आश्रम भी खोले जो बाद में ब्रिसबेन तक फैल गए. हालांकि स्थानीय बिशप उनकी संस्था के बढ़ते काम से खुश नहीं थे.

अकसर बीमार रहने वाली मैककिलोप का 1909 में 67 साल की उम्र में निधन हो गया. उस वक्त वह 750 ननों की नेता थी और उनका संगठन 117 स्कूल और अनाथ आश्रम चलाता था. अब सिसटर्स ऑफ सेंट जोसेफ संस्था युगांडा, पेरू, ब्राजील और थाइलैंड जैसे देशों में भी काम करती है.

मैरी मैककिलोप के निधन के 52 साल बाद 1961 में उन्होंने बेहद गंभीर ल्यूकेमिया से पीड़ित महिला को ठीक करने का श्रेय दिया गया. इस घटना को चमत्कार घोषित करते हुए 1995 में मैककिलोप को दैवीय शक्तियों से युक्त घोषित किया गया. पिछले साल दिसंबर में वेटिकन इस बात पर सहमत हो गया कि मैककिलोप ने मृत होते हुए भी 1993 एक अन्य महिला को ठीक किया. संत बनने के लिए दो चमत्कारों को मान्यता मिलने के बाद मैककिलोप के संत बनने का रास्ता साफ हुआ. मैककिलोप को आधुनिक ऑस्ट्रेलिया में बहुत सम्मान दिया जाता है.

रिपोर्टः एजेंसियां/ए कुमार

संपादनः ओ सिंह

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