″मैं कभी कोई प्रतियोगिता जीतूंगा″ | फीडबैक | DW | 21.06.2013
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फीडबैक

"मैं कभी कोई प्रतियोगिता जीतूंगा"

दूरदर्शन पर हमारा वीडियो शो मंथन पाठकों को भा रहा है, वेबसाइट पर हमारे आलेखों को पढ़ने के बाद अक्सर पाठक अपनी राय हमें भेजते रहते हैं, जानिए आप भी हाल ही में क्या लिखा है उन्होंने अपने संदेशों में....

विविधता और जिम्मेदारी का सम्मेलन - डीडब्ल्यू के सफलतम 60 साल और ग्लोबल मीडिया फोरम का आयोजन दोनों का संगम अपने आप में एक अनूठा संयोग है. जर्मन संस्कृति मंत्री ने इस अवसर पर डीडब्ल्यू को 60 साल के परिपक्व बुजुर्ग की संज्ञा दी. मुझे एक जुमला याद आ गया- '60 साल के बुड्ढे या साठ साल के जवान' मुझे तो लगता है कि डीडबल्यू 60 साल के बाद आज और ज्यादा तरोताजा, साज-सज्जा से भरपूर और जवां हो गया है. ग्लोबल मीडिया के पर्दे पर समय और परिस्थितियों के मुताबिक अपने आपको ढालकर परिपक्वता के साथ-साथ निष्पक्षता की अनूठी मिसाल प्रस्तुत की है. एक बार जो पाठक डीडब्ल्यू की वेबसाइट पर आ गया वह दुबारा विजिट करना नहीं भूलता. वहीं ग्लोबल मीडिया फोरम में दुनिया भर के बुद्धिजीवियों का जमावड़ा निम्न-मध्यम वर्ग के हितों के लिए मीडिया की भूमिका पर जो विचार-मंथन करेगा वह शायद वैश्विक बदलाव की भूमिका तैयार कर देगा. इस अवसर पर मेरी हार्दिक शुभकामनाएं.

माधव शर्मा, एसएनके स्कूल, राजकोट, गुजरात

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मार्च माह की पहेली प्रतियोगिता के विजेता चुने जाने पर आपके द्वारा भेजा पुरस्कार आईपॉड (शफल) मुझे मिल गया है. मैंने कभी आशा भी नहीं की थी कि मैं कभी कोई प्रतियोगिता जीतूंगा. मैं भावना का वर्णन नहीं कर पा रहा हूं, सच में बहुत अच्छा लग रहा है. फेसबुक पर आपके, डॉयचे वेले-हिंदी में लेख पढ़ना मुझे काफी पसंद है. सभी लेख आज के समय के लिए बहुत समकालीन हैं और बहुत ही प्रासंगिक हैं. विशेष रूप से विज्ञान से संबंधित मुद्दों पर लेख उल्लेखनीय है. आपने बहुत अच्छी तरह से लेख की गुणवत्ता को बनाए रखा है. डॉयचे वेले हिंदी सेवा के समस्त कर्मचारीगण को मेरी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं.

अभय कुमार, जूनागढ़, गुजरात

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मंगलमय जेठ के मंगल - ज्येष्ठ के मंगल हों और नवाबों के शहर में आपके कदम तो फिर पूछना ही क्या. मैं पिछले चार सालों से लखनऊ में रह रहा हूं और ज्येष्ठ के मंगलों में लगने वाले भण्डारे का आन्नद लेना कभी नहीं भूलता. शुरुवात में तो कुछ अजीब से लगता था. जहां देखो मंगल के दिन शहर में शादी सा माहौल नजर आता है. हर तरफ सड़कों पर तम्बू-कनात लगे दिख जाते हैं और उसके इर्द-गिर्द सैकड़ों की तादाद में प्रसाद ग्रहण करते लोग. क्या सेठ और क्या फकीर हर कोई प्रसाद के लिए लालायित रहता है. आय ज्यादा हो या कम, श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार भक्त पूड़ी-सब्जी से लेकर आइसक्रीम और कोल्ड ड्रिंक तक प्रसाद के रूप में बंटवाते हैं. फिलहाल बड़े मंगल का महात्म्य अभी तक मैंने लखनऊ में ही देखा है. डॉयचे वेले से एस. वहीद की रिपोर्ट से इसके ऐतिहासिक पहलू की जानकारी भी हो गई अब तो इसका आनन्द और भी बढ़ गया. एक अच्छी और ज्ञानवर्धक रिपोर्ट के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

रवि श्रीवास्तव, इंटरनेशनल फ्रेंडस क्लब, इलाहाबाद

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नेपाली माओवादियो को चीन की मदद से परेशान बीजेपी - मओवादियों का नेपाल में बढ़ता असर निश्चय ही हमारे देश की कमजोर विदेश नीति का ज्वलंत उदाहरण है. भारत की अपेक्षा चीन का बढ़ता असर बहुत ही आश्चर्यजनक है क्योंकि भारत और नेपाल की बहस में अत्यधिक समानता है हमारी धार्मिक आस्थाएं भी एक हैं, दूसरी और भाषा, संस्कृति में इतनी असमानता होते ही भी चाइना का नेपाली जनता पर प्रभाव होना हमारे शासक वर्ग की घोर उदासीनता और नेपाल को महत्वहीन समझने के सामान है. वर्तमान में भी सरकार कोई गंभीर रुख नहीं अपना रही है जिसका मूल्य हमें भविष्य में चुकाना होगा.

हरीश चन्द्र शर्मा, जिला अमरोहा, उत्तर प्रदेश

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मैं हर शनिवार दिल्ली दूरदर्शन चैनल पर डॉयचे वेले का विज्ञान, पर्यावरण, और स्वास्थ्य संबंधित मैगजीन शो 'मंथन' देखना कभी नही भूलता. आपके वेबपेज पर सर्जरी से पेट छोटा करने की और "बैरियैट्रिक सर्जरी" से जानकारी मिली. यह सर्जरी आम आदमी के लिए बहुत महंगी साबित होती है. इसलिए अच्छा यही है कि जीवन को समय रहते ही सही खानपान और व्यायाम से मोटापे की समस्या से मुक्त रहने का प्रयास करें. इसके अलावा "मंगलमय जेठ के मंगल" के बारे मे डॉयचे वेले की रिपोर्ट अच्छी लगी. इस परंपरागत पर्व के बारे मे मुझे पहले पता नही था.

सुभाष चक्रबर्ती, नई दिल्ली

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संकलनः विनोद चड्ढा

संपादनः आभा मोंढे

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