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मनोरंजन

मैं आमिर के झांसे में आ गई: किरन राव

"जब मुझे पहली बार उससे प्यार हुआ था, मुझे पता ही नहीं था कि वह कितनी प्रतिभाशाली है. उसकी स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद मैं दंग रह गया और मुझे फिर से प्यार हो गया." अपनी पत्नी किरन राव के बारे में आमिर खान का कहना है.

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मुंबई के धोबी

और किरन ने आमिर को ठुकरा दिया, मना कर दिया उसे अपनी फिल्म धोबी घाट में लेने से. लेकिन आमिर तो आमिर ठहरे. मनाते रहे, रिझाते रहे. किरन कहती हैं, '' आखिर उसकी जुगत काम आ गई, उसकी शैतानी और मैकियावेलियन चाल से मैं झांसे में आ गई. ''

लेकिन

Aamir Khan

चाल काम आ गई.

आमिर का कहना है कि यह चाल नहीं थी. फिल्म का वह चरित्र इतना बिगड़ा हुआ था कि एक दिन सुबह मेरी रंगत देखने के बाद किरन ने तय कर लिया कि यह मेरे ही बस का है. मामला कुछ भी हो, आमिर का कहना है कि जब किरन ने उससे कहा कि वह एक पटकथा लिख रही है तो वह घबरा गए थे. आमिर ने सोचा था कि जब किरन लिख लेगी, तो उसे पढ़ना पड़ेगा, और अगर उसे पसंद न आए तो? वह चाहते थे कि यह स्क्रिप्ट कभी खत्म न हो. लेकिन जब उन्होंने स्क्रिप्ट पढ़ी, तो इतनी पसंद आई कि वो तुरंत अपनी बीवी की फिल्म में हीरो बनना चाहते थे.

धोबी घाट किरन राव की पहली फिल्म है, और रविवार को टोरंटो में उसका विश्व प्रीमियर हुआ. किरन और आमिर जाहिर है कि मौजूद थे. आमिर से पूछा गया कि कैमरा के सामने अपनी बीवी का हुक्म बजाना कैसा लगा? आमिर का जवाब था, बिल्कुल घर जैसा लग रहा था.

इस फिल्म में उभरते कलाकार अरुण की कहानी कही गई है, जो शाई के साथ चक्कर चलाने की कोशिश करता है.शाई भारतीय मूल की अमेरिकी है, जो रिश्तेदारों से मिलने मुंबई आई हुई है, और दोनों का किस्सा मुंबई के धोबी घाट की पृष्ठभूमि में चलता है.

कहानी आमिर को बेहद पसंद आई. वह कहते हैं, बेहद नाजुक और खूबसूरत कहानी है. उसके चरित्र बिल्कुल अलग और अनोखे अंदाज में बातें करते हैं. पढ़ने के बाद मैंने सोचा, कैसी लाजवाब औरत से शादी की है मैंने !

और कहानी अगर धोबी घाट की है, तो धोबी की राय जानना जरूरी है. फिल्म में धोबी जोहैब की भूमिका निभाने वाले प्रतीक बब्बर का कहना है कि अरुण और शाई की जोड़ी बेहद हसीन लगती है. फिल्म में प्रतीक की ऐक्टिंग को भी टोरंटो के दर्शकों ने खूब सराहा है.

लेकिन आमिर का कहना है कि अगर टोरंटो में यह फिल्म पसंद की जाती है, इसका मतलब यह नहीं होगा कि भारत में वह चलेगी. अगर टोरंटो या कान में पुरस्कार मिल जाए, तो भारत में अक्सर इसका मतलब यह समझा जाता है कि यह फिल्म देखने लायक नहीं है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/उभ

संपादन: ओ सिंह

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