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मनोरंजन

मेरा मुकाबला खुद से हैःरणबीर कपूर

रणबीर कपूर ने बेशरम में पहली बार पिता ऋषि कपूर और मां नीतू कपूर के साथ काम किया है. कपूर खानदान के वारिस रणबीर मानते हैं कि उनका मुकाबला खुद से है, दूसरों से नहीं. डीडब्ल्यू से उनकी बातचीत के मुख्य अंशः

डीड्ब्ल्यूः एक के एक बाद हिट फिल्में देकर आप अपने इस समय के दूसरे अभिनेताओं से आगे निकल आए हैं. क्या इससे खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं ?

रणबीर कपूरः मैं तो शुरू से ही खुद को सुरक्षित मानता रहा हूं. मेरा नजरिया यह है कि किसी अभिनेता को दूसरे के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन की कोशिश करने की बजाय खुद हर फिल्म के साथ अपने अभिनय को बेहतर बनाने का प्रयास करना चाहिए. अभी मुझे इस उद्योग में काफी दूरी तय करनी है. ढेरों लोग मुझसे काफी आगे हैं.

आप अपने छोटे से करियर में कई हिट फिल्में दे चुके हैं. क्या बॉलीवुड में सफलता का कोई तय फार्मूला है ?

ऐसा कुछ नहीं है. दर्शक विशुद्ध मनोरंजन चाहते हैं. बॉलीवुड की फिल्मों में तीन घंटे के भीतर दर्शकों को संगीत, एक्शन, कामेडी, रोमांस और नाटक यानी सबकुछ मिल जाता है. बेहतर पटकथा, निर्देशन और अभिनय की ट्यूनिंग से ही कामयाबी मिलती है.

आज आपकी स्थिति काफी मजबूत है. क्या दूसरों की तरह आप भी अपनी अभिनेत्रियों के चुनाव में हस्तक्षेप करते हैं ?

मैं कभी किसी फिल्म के कलाकारों के चयन में हस्तक्षेप नहीं करता. पता नहीं इस स्थिति में हूं भी या नहीं. अपनी दस फिल्मों में से ज्यादातर में मैंने नई अभिनेत्री के साथ काम किया है. मेरे लिए निर्देशक की अहमियत अभिनेत्री से ज्यादा है. मुझे खुशी है कि निर्देशक मेरे साथ काम करना पसंद करते हैं. अभिनेत्री और दूसरे कलाकारों का चयन निर्देशक पर निर्भर है. मैं इसमें दखल नहीं देता.

हिंदी फिल्मों में पिछले पांछ-छह दशकों में कैसे बदलाव आए हैं ?

काफी कुछ बदल गया है. तकनीक की प्रगति ने फिल्म निर्माण में क्रांति पैदा कर दी है. इनके सहारे अब ऐसे-ऐसे दृश्यों का फिल्मकांन संभव है जिनके बारे में पहले कोई सोच तक नहीं सकता था. अब फिल्मों का बजट भी काफी बढ़ गया है. लेकिन तमाम प्रगति और भव्यता के बावजूद मुझे लगता है कि मेरे दादा यानी राजकपूर का दौर फिल्मों का स्वर्णकाल था. पचास-साठ का वह दशक बॉलीवुड के साथ हॉलीवुड के लिए भी एक सुनहरा दौर था. उस समय बनी कई फिल्में आज भी प्रासंगिक हैं. लेकिन यह भी हिंदी सिनेमा का बेहतरीन दौर है.

पहले और अब के अभिनेताओं में क्या अंतर महसूस करते हैं?

मेरे पिता के दौर में हर अभिनेता तमाम फिल्म में एक जैसे किरदार निभाता था. इसकी वजह यह थी कि दर्शकों के मन में उनकी एक छवि बन जाती थी जिसे तोड़ने का जोखिम न तो वह अभिनेता लेता था और न ही निर्माता. अब के अभिनेताओं का नजरिया बदला है. वह किसी एक किरदार में बंधे रहने की बजाय अलग-अलग भूमिकाएं तलाशते रहते हैं. अब लोग नएपन की कोशिश में खतरा उठाने से भी नहीं हिचकते. मौजूदा दौर में ज्यादातर अभिनेता फिल्मों की संख्या की बजाय बेहतर किरदार निभाने पर जोर देते हैं. वह पहले के अभिनेताओं के मुकाबले कम फिल्में हाथ में ले रहे हैं. इस बदलाव का दूसरा पहलू यह है कि संगीत का स्तर गिरा है. पहले के गीतों में कर्णप्रिय धुनें होती थीं और उनमें कविता की लयबद्धता थी. लेकिन अब संगीत फास्ट फूड की तरह हो गया है.

क्या स्टार माता-पिता का पुत्र होने की वजह से आप पर कामयाबी का दबाव था?

ऐसा दबाव तो कभी नहीं रहा क्योंकि मैं बचपन से ही फिल्मों और शूटिंग का अभ्यस्त रहा हूं. हां, कई बार मुझे खुद को अभिनेता के तौर पर साबित करने के लिए ज्यादा मेहनत व संघर्ष करना पड़ा है ताकि लोग यह नहीं कहें कि मुझे कपूर खानदान का होने की वजह से फिल्में मिल रही हैं, अपनी प्रतिभा के बूते नहीं.

करियर में पहली बार मां-बाप के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

किसी भी बच्चे के लिए मां-बांप के साथ काम करने की सोच डरावनी होती है. लेकिन मैं खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि मुझे ऐसे किसी डर से नही जूझना पड़ा. वह दोनों महान और पेशेवर अभिनेता है. उनके साथ काम करने का अनुभव काफी बढ़िया रहा. इस फिल्म के दौरान मेरे मन का रहा-सहा संकोच भी दूर हो गया. उन दोनों ने मुझ पर कभी कुछ थोपने का प्रयास नहीं किया. उल्टे मैं ही उनके किरदारों पर अपने सुझाव देता रहा.

आपने बेशरम में काम करने का फैसला क्यों किया ?

इसमें एक नए किस्म का किरदार है जहां मुझे अपनी प्रतिभा को दिखाने का मौका मिल सकता था. इसके अलावा मैं निर्देशक अभिनव कश्यप के काम का जबरदस्त प्रशंसक रहा हूं. इसकी कहानी भी पसंद आई थी. यही सब सोच कर मैंने इसमें काम करने का फैसला किया.

अब तो आप निर्देशक भी बन गए हैं. क्या छोटे परदे के लिए भी कुछ करने का इरादा है ?

हां, पहले मैं सोचता था कि निर्देशन मेरे बस की बात नहीं है. लेकिन बाद में मैंने सोचा कि हाथ आजमाने में हर्ज ही क्या है. उस फिल्म जग्गा जासूस के किरदारों को लोकप्रिय बनाने के लिए टीवी पर एक छोटे सीरियल करने की योजना है. लेकिन अभी कुछ भी तय नहीं है.

इंटरव्यूः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः एन रंजन

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