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दुनिया

मेमन के डेथ वारंट पर सोमवार को सुनवाई

फांसी की सजा से पहले 1993 मुंबई सीरियल बम धमाकों के दोषी याकूब अब्दुल रजाक मेमन ने नागपुर जेल में अपने परिवार से मुलाकात की. सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य मामले में कहा है कि मौत की सजा जिंदगी भर जेल में रहने से बेहतर है.

दो दशक से भी ज्यादा बीतने के बाद 1993 मुंबई बम धमाकों के लिए दोषी पाए गए याकूब मेमन को 30 जुलाई को फांसी का सजा दी जानी है. गुरुवार को नागपुर की कड़ी सुरक्षा वाली जेल में मेमन से पत्नी और बेटी ने मुलाकात की. इस हफ्ते मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू की अगुवाई में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने याकूब की मृत्यु दंड को बदलने की याचिका को अस्वीकार कर दिया. इसके तुरंत बाद मेमन ने महाराष्ट्र के राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दायर की. याकूब मेमन मुंबई बम धमाकों का अकेला अभियुक्त है जिसे मृत्युदंड की सजा सुनाई गई है. 53 वर्षीय मेमन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में उसकी मृत्युदंड की सजा पर रोक लगाने के लिए दायर याचिका में दलील थी कि अभी सारे कानूनी उपायों का इस्तेमाल नहीं किया गया है.

अब याकूब मेमन ने अपने डेथ वॉरंट को चुनौती देते हुए याचिका दाखिल की है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार को सुनवाई करेगा. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद टाडा कोर्ट ने मेमन का डेथ वॉरंट जारी किया था. मेमन के वकील ने आज न्यायालय के समक्ष मामले को पेश किया. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा, 'मैंने यह मामला एक पीठ को सौंप दिया है. इस पर सोमवार तक सुनवाई होगी.' इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी की याचिका पर भी सुनवाई करेगा, जिसमें याकूब की सजा पर स्टे मांगा गया है.

मेमन की दया याचिका का समर्थन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने किया था. पार्टी का मानना है कि मृत्युदंड दिए जाने से कोई न्याय नहीं होगा. उन्होंने अनुरोध किया कि मेमन की दया याचिका यह कह कर स्वीकार कर लेनी चाहिए कि उसने खुद आत्मसमर्पण किया और अधिकारियों के साथ जांच में सहयोग भी. सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सीपीआई (एम) ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कानून के चंगुल से निकल पाने वाले बम विस्फोट कांड के दूसरे दोषियों से अलग मेमन ने आत्मसमर्पण का रास्ता चुना. कोर्ट ट्रायल से गुजरकर, जांच अधिकारियों की मदद करते हुए उसने भारतीय कानून व्यवस्था पर भरोसा जताया है. पार्टी ने एक प्रेस वक्तव्य में लिखा है, "इसके बावजूद उस अकेले को मौत की सजा सुनाई गई जबकि बाकी दोषी अभी भी मुक्त हैं. यह न्याय नहीं होगा अगर मेमन को उम्र कैद की बजाए मृत्युदंड दे दिया जाता है. सीपीआई (एम) सैद्धांतिक रूप से मृत्युदंड की सजा को खत्म किए जाने की मांग करती आई है." 1993 के मुंबई बम हमलों को 257 लोगों की जान लेने वाला "एक घृणित आतंकी हमला" बताते हुए पार्टी ने कहा कि इसके लिए जिम्मेदार अपराधियों को भारतीय कानून के तहत सजा जरूर दी जानी चाहिए.

मेमन को सुनाई गई मृत्युदंड की सजा को बदलने के समर्थन में सीपीआई (एम) ने राजीव गांधी हत्याकांड मामले के दोषियों का उदाहरण दिया. उन सभी दोषियों की मृत्युदंड की सजा को बदलकर उम्र कैद कर दिया गया था. उम्रकैद की सजा में कई श्रेणियां हैं जिनमें से एक में कोर्ट इसे "ताउम्र” यानि दोषी की आखिरी सांस तक सजा काटने का हुक्म दोती है. इस पर खुद सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ऐसे दोषियों को मृत्युदंड देना बेहतर विकल्प होता है. पांच जजों वाली एक संवैधानिक बेंच की अगुवाई करने वाले मुख्य न्यायाधीश दत्तू ने कहा, “हम सब आशा में जीते हैं, अगर ऐसे दोषियों के लिए कोई उम्मीद ही ना बची हो तो उन्हें पूरे जीवन जेल में रखने का क्या औचित्य है.” मृत्युदंड के खिलाफ जोर शोर से आवाज उठाने वाले अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने मेमन की अपील को रद्द किए जाने को "निराशाजनक और प्रतिगामी कदम" बताया है.

आरआर/एमजे (पीटीआई, एएफपी)

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