1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

मृत्युदंड में भी गरिमा रहे बरकरार

भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा पाए दो लोगों को फांसी पर चढ़ाने की कार्रवाई रोक दी है. कोर्ट ने कहा कि सबसे कड़ी सजा के भोक्ता को भी जीते जी जीवन की गरिमा और अपील के लिए समय पाने का पूरा अधिकार है.

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस एके सिकरी और यूयू ललित की पीठ ने 15 मई को एक महिला शबनम और पुरुष सलीम को सुनाई गई फांसी की सजा के फैसले पर स्टे ऑर्डर जारी किया है. यह आदेश बचाव पक्ष के वकील आनंद ग्रोवर की अपील पर आया है जिन्होंने अदालत को बताया कि 15 मई को दिए फैसले के मात्र 6 दिन बाद ही उन्हें फांसी पर चढ़ाए जाने का वॉरंट जारी कर दिया गया, जबकि दोषी को फैसले के विरुद्ध अपील के लिए अनिवार्य 30 दिन का समय मिलना चाहिए.

एडवोकेट ग्रोवर ने बताया कि अमरोहा के सत्र न्यायाधीश ने 21 मई को ही दोषियों को फांसी पर चढ़ाए जाने के वॉरंट पर दस्तखत कर दिया था, जिसके बाद उन्हें कभी भी मृत्युदंड दिया जा सकता था. इस मामले को संज्ञान में लेते हुए जस्टिस सिकरी और ललित की पीठ ने ना केवल उस वॉरंट को रद्द किया बल्कि केन्द्र और यूपी सरकार को इसके बाबत नोटिस भी जारी किया. अब सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई होगी.

मामला उत्तर प्रदेश में अमरोहा की रहने वाली शबनम नाम की महिला का है, जिस पर 2008 में अपने प्रेमी सलीम के साथ मिलकर परिवार के 7 सदस्यों की हत्या का आरोप लगा था. 15 मई को मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू और दो अन्य न्यायाधीशों की बेंच ने इस मामले में अभियुक्तों की अपील रद्द करते हुए यूपी के ट्रायल कोर्ट की तय की गई फांसी की सजा को कायम रखा.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दोषियों शबनम और सलीम को अपने सारे कानूनी अधिकार इस्तेमाल करने के बाद भी राज्य के राज्यपाल या देश के राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर करने का अधिकार है. कोर्ट ने साफ किया कि केवल फांसी की सजा सुनाए जाने भर से देश के प्रत्येक नागरिक को प्राप्त मूल अधिकार और संविधान की धारा 21 के तहत मिला जीवन का अधिकार खत्म नहीं हो जाता. उन्हें भी गरिमा के साथ जीने का पूरा अधिकार होता है. कोर्ट ने बताया कि प्रावधानों के अनुसार सजायाफ्ता व्यक्ति की गरिमा बरकरार रखते हुए कम से कम तकलीफदेह तरीके से मृत्युदंड दिए जाने और अपने परिवार से मिलने का अधिकार होता है. 2013 में भारतीय संसद पर हमले में दोषी पाए गए अफजल गुरु को परिवार को समय से बताए बिना नई दिल्ली के तिहाड़ जेल में गुपचुप तरीके से फांसी दे दी गई थी. जिसकी मानवाधिकार संगठनों ने कड़ी आलोचना की थी.

दूसरी ओर अमेरिका के नेब्रास्का प्रांत में विधिनिर्माताओं ने मृत्युदंड की सजा खत्म करने के एक विधेयक को अंतिम मंजूरी दे दी है. यदि यह कानून में बदल पाता है तो 1973 के बाद से ऐसा करने वाला नेब्रास्का पहला कंजर्वेटिव राज्य होगा. परंपरागत रूप से अमेरिका में कंजर्वेटिव्स मृत्युदंड के कट्टर समर्थक रहे हैं इसलिए भी नेब्रास्का का मामला उल्लेखनीय है. अमेरिका के पांच राज्यों में मृत्युदंड पर रोक लग चुकी है जबकि 32 राज्यों और केंद्र सरकार में अभी भी इसकी मान्यता है. अमेरिका में बिजली के झटके, जहरीले इंजेक्शन और दूसरे कई तरीकों से मृत्युदंड दिया जाता है.

आरआर/एमजे (पीटीआई, एपी)

DW.COM

संबंधित सामग्री