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दुनिया

मूर्खों की पंचायत का एक और फरमान

समय, साधन, जीवनशैली और तकनीक, सब बदल रहे हैं लेकिन भारतीय समाज के कुछ धड़े अब भी आदम काल में जीना चाहते हैं. उत्तर प्रदेश की एक पंचायत का फैसला इस बात की तसदीक करता है.

उत्तर प्रदेश की बावली गांव में अयोजित पंचायत में सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए पंचायत ने लड़कियों के जींस और तंग कपड़े पहनने पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है . पंचायत के अनुसार लड़कियों का पहनावा दिन ब दिन बिगड़ता जा रहा है, जो समाज के साथ साथ खुद लड़कियों के हित में नहीं है. पंचायत ने सर्वसम्मति के आधार पर निर्णय लिया कि जींस या तंग कपड़े पहनने वाली लड़कियों और औरतों का विरोध किया जाएगा. पंचायत का फैसला ना माने जाने पर लड़की और उसके परिवार का सामाजिक बहिष्कार किया जायेगा.

महिला प्रधान वाली इस पंचायत का मानना है कि जींस और तंग कपड़े भारतीय संस्कृति और माहौल के हिसाब से उपयुक्त नहीं है. महिलावादी विचारों के उलट इस पंचायत का मानना है कि भारतीय समाज में हमेशा से महिलाओं के शरीर को ढंकने की परंपरा रही है. भारतीय परिवेश में लड़कियों के तंग कपड़े पहनने से शर्म-हया की परंपरा को चोट पहुंचती है.

स्त्री पहनावे को लेकर सोच

यह पहला मामला नहीं है जब लड़कियों के कपड़े में अनैतिकता देखी जा रही है. कभी लड़कियों के कपड़े को भड़काऊ बता कर स्त्री शरीर से खेलने वालों को सुरक्षा कवच मुहैया कराया जाता है. तो कभी बढ़ते रेप के लिए लड़कियों के रहन सहन को ही जिम्मेदार बता दिया जाता है. हरियाणा के खाप पंचायत स्त्री पहनावे के खिलाफ अपने तुगलकी फरमान के लिए बदनाम हैं लेकिन अब उत्तरप्रदेश और बिहार से भी स्त्री विरोधी तालिबानी फरमान आने शुरू हो गए हैं.

कुछ अरसा पहले बिहार की हथुआ पंचायत ने फैसला सुनाते हुए लड़कियों के जींस पहनने और मोबाइल फोन रखने पर प्रतिबंध लगा दिया था. लड़कियों को भटकने से रोकने के नाम पर पंचायत द्वारा यह प्रतिबंध लगाया गया था. इस मामले में गांव और शहर सब बराबर हैं. शहरों में लोग इस पर सार्वजानिक रूप से कुछ नहीं बोलते लेकिन बंद कमरों में पहनावे पर ऐतराज बहुतों को है. जींस के खिलाफ तो लोग खुले आम बोलते हैं. कुछ अरसे पहले गायक येसुदास ने जींस को भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताते हुए, जींस पहनने वाली महिलाएं को मर्दों के लिए मुश्किलें पैदा करने वाला बताया था.

मर्यादा की 'लक्ष्मण रेखा'

महिलाओं के पहनावे को लेकर अक्सर बहस होती रहती है. कुछ लोग कपड़े पहनने के तौर तरीके को बलात्कार की घटनाओं से जोड़ कर देखते हैं. समाज का एक बड़ा तबका जिसमे खुद महिलाएं शामिल हैं, पहनावे में मर्यादा या शालीनता का समर्थन करती हैं. जब कभी रेप की बढ़ती घटनाओं पर चिंतन होता है महिलाओं को मर्यादित पहनावे के साथ लक्ष्मण रेखा में रहने की नसीहत दी जाने लगती है. नसीहत देने वाले कोई आम लोग नहीं होते. बीजेपी के एक बड़े नेता और मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की 'लक्ष्मण रेखा' लांघने पर ‘सीताहरण' वाला बयान बरबस याद आ जाता है. कैलाश विजयवर्गीय अकेले नहीं हैं जो महिलाओं को मर्यादा में रहने की सलाह देते हैं. अक्सर मां बाप भी अपनी बेटियों को पहनावे में मर्यादा बरतने की सलाह देते हैं. पूर्वा जोशी कहती हैं, "एक लड़की को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं, इसकी स्वतंत्रता लड़की को होनी चाहिए ना कि किसी और को. यहां तक कि पेरेंट्स को भी नहीं." लेकिन खुद पूर्वा कहती हैं कि दादा दादी, नाना नानी और उनके माता पिता भी उनके पहनावे को लेकर सलाह देते रहते है.

शर्म-हया की भारतीय परंपरा को औरतों में, खासतौर पर औरतों के कपड़ों में देखा जाना उचित नहीं है. कभी कपड़े को तो कभी रात में लड़कियों के अकेले घूमने को रेप की वजह बताया जाने लगे तब ऐसे में कामकाजी नेहा वर्मा का सवाल जायज लगता है. पहनावे और दिन रात के तर्क को निरस्त करते हुए नेहा प्रश्न करती हैं, "साड़ी पहनी महिला के साथ दिन के उजाले में रेप क्यों होते हैं?"

रिपोर्ट: विश्वरत्न

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