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दुनिया

मुसलमानों को भी हाथ मिलाना होगा

स्विट्जरलैंड में दो मुसलमान छात्रों ने महिला टीचर से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया.धर्मनिरपेक्ष देश में इस पर तीखी बहस छिड़ गई. प्रशासन ने टीचर के हक में फैसला सुनाया.

भारत में जिस तरह नमस्कार कहा जाता है या फिर सलाम किया जाता है, उसी तरह पश्चिमी देशों में हाथ मिलाकर एक दूसरे का अभिवादन किया जाता है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपके सामने बच्चे हैं, महिलाएं हैं या फिर बुजुर्ग. हाथ मिलाकर अभिवादन करना दोस्ताना माना जाता है.

लेकिन इस्लाम में महिलाओं से हाथ मिलाने की मनाही है. गैर महिला से नजरें मिलाना भी वर्जित है. ऐसे में संस्कृतियों का टकराव भी सामने आ रहा है. ताजा मामला स्विट्जरलैंड का है. अप्रैल में जर्मन सीमा से सटे स्विस शहर बाजेल में दो मुस्लिम छात्रों ने महिला टीचर से हाथ मिलाने से इनकार कर दिया. छात्रों ने कहा कि उनका धर्म विपरीत लिंग के ज्यादातर लोगों को छूने से रोकता है.

इसके बाद स्कूल ने मुस्लिम छात्रों को महिला टीचरों से हाथ न मिलाने की छूट दी. लेकिन जैसे ही यह खबर बाहर आई, देश भर में हंगामा हो गया. अखबारों और टेलिविजन चैनलों ने छात्रों के रुख की कड़ी आलोचना की. उन्होंने तर्क दिया कि छात्र जिस देश में रह रहे हैं, उन्हें वहां की संस्कृति के साथ घुलना मिलना चाहिए.

मामला स्विस शिक्षा प्राधिकरण तक पहुंचा. प्राधिकरण ने फैसला सुनाते हुए कहा है, "हाथ मिलाने की मांग करना टीचर का अधिकार है." हाथ मिलाने से इनकार करने वाले छात्रओं के माता पिता या अभिभावकों पर 5,000 यूरो तक जुर्माना ठोंका जा सकता है. फैसले में यह भी कहा गया है कि छात्रों से हाथ मिलाना स्विट्जरलैंड की संस्कृति का अहम हिस्सा है.

द इस्लामिक सेंट्रल काउंसिल ऑफ स्विट्जरलैंड ने फैसले की आलोचना की है. हाथ मिलाने से छूट देने के स्कूल के फैसले के सही बताते हुए काउंसिल ने प्राधिकरण पर अधिकार क्षेत्र से बाहर आने का आरोप लगाया है. विपरीत लिंग के लोगों के साथ हाथ मिलाने के फैसले की अनिवार्यता को "एकदलवाद" करार दिया.

यूरोप में पसरती घबराहट

स्विट्जरलैंड में करीब साढ़े तीन लाख मुसलमान रहते हैं. कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ चार फीसदी है. लेकिन बीते कुछ सालों में देश में इस्लाम के बढ़ते प्रभाव को लेकर अंदरखाने एक चिंता पसर रही है. 2009 में जनमत संग्रह के बाद देश की मस्जिदों में मीनार निर्माण पर रोक लगा दी गई. नंवबर 2015 में एक स्विस राज्य ने महिलाओं के पूरे बुर्के पर पाबंदी लगा दी.

स्विट्जरलैंड में जनमत संग्रह की अहमियत संसद जितनी ही है. राजनैतिक पार्टियों के इनकार के बावजूद जनता चाहे तो जनमत संग्रह के जरिए अपना फैसला कर सकती है.

पश्चिम में स्विट्जरलैंड को आम तौर पर बेहद सहनशील देश माना जाता है. ज्यादातर आबादी के ईसाई होने के बावजूद वहां धर्म का दखल ना के बराबर है. देश का संविधान पंथनिरपेक्षता को हर धर्म से ऊपर मानता है. लेकिन बीते कुछ समय से वहां लोगों को लगने लगा है कि कट्टर इस्लाम इस स्वतंत्रता पर हावी होने की कोशिश कर रहा है. ऐसी ही बहस फ्रांस और जर्मनी समेत यूरोप के कुछ और देशों में चल रही है.

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