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दुनिया

मुश्किल हो जाएगा भारत के इंजीनियरों के लिए अमेरिका जाना

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी होने के बाद जब नौकरी लगती है तो ऑन साइट के लिए मशक्कत की जाती है. लेकिन भारतीयों का अमेरिकी सपना धुंधलाता नजर आ रहा है.

अमेरिका की वीजा नीति में प्रस्तावित बदलाव से भारतीय सूचना तकनीक कंपनियां और उनमें काम करने वाले लोग काफी चिंतित हैं. उनके अमेरिकी सपने धुंधलाने लगे हैं. उक्त विधेयक के पारित होने के बाद भारतीय कंपनियां बड़े पैमाने पर एच-1बी और एल-1 वीजा पर आईटी पेशेवरों को अमेरिका नहीं भेज सकेंगी. इससे उनके कारोबार में 30 से 40 फीसदी गिरावट का अंदेशा है. अमेरिकी संसद में हाल में व्यापक आप्रवास विधेयक (कंप्रीहेंसिव इमीग्रेशन बिल) पेश किया गया है. वीजा की दर में भारी बढ़ोतरी से परेशानी से जूझ रही इन कंपनियों के लिए यह दोहरा झटका साबित होगा.

अब सूचना तकनीक क्षेत्र की प्रमुख कंपनियों में काम करने वाले कुछ इंजीनियरों को अमेरिका में काम करने का सपना छोड़ना पड़ सकता है. इन वीजा के सहारे 50 से 100 कर्मचारियों वाली आईटी कंपनियां अपने ऐसे मित्रों और परिजनों को अमेरिका बुला सकती थीं जिन लोगों ने दूसरे स्तर के इंजीनियरिंग कॉलेजों से डिग्री ली हो. लेकिन अब उनकी योजना भी खटाई में पड़ सकती है. ऐसे वीजा पर अमेरिका जाने वाले पहले अपनी नौकरियां बदल सकते थे. अब उनकी राह मुश्किल हो जाएगी.

मुश्किलें और चिंता

पश्चिम बंगाल के सूचना तकनीक मंत्री ब्रात्य बसु कहते हैं, "अगर यह विधेयक पारित हो जाता है तो इसका प्रतिकूल असर पड़ना लाजिमी है. लेकिन मुझे उम्मीद है कि आईटी कंपनियां इस संकट से उबरने के उपाय तलाश लेंगी." एक आईटी कंपनी इंडस नेट टेकनॉलॉजीज के संस्थापक और सीईओ अभिषेक रूंगटा कहते हैं, "जिन कंपनियों की बड़ी परियोजनाएं अमेरिका में चल रही हैं, उनको मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. ऐसी कंपनियों को या तो वहां से अपना कारोबार कहीं और शिफ्ट करना होगा या फिर स्थानीय लोगों को नौकरी पर रखना होगा."

एक अन्य तकनीकी कंपनी के प्रमुख अनिमेष चौधरी कहते हैं, "भारतीय आईटी कंपनियों के ज्यादातर ग्राहक अमेरिका के हैं. ऐसे में उनके कारोबार में 30 से 40 फीसदी गिरावट आ सकती है." कॉग्निजेंट टेकनॉलॉजी साल्यूशंस (सीटीएस) के 80 फीसदी से ज्यादा ग्राहक अमेरिकी हैं. इसी तरह टाटा कंसलटेंसी सर्विस (टीसीएस) का 50 फीसदी टर्नओवर अमेरिका से आता है. लेकिन उसके कई अन्य देशों में भी ग्राहक हैं. सीटीएस के मैनेजर संतोष भक्त कहते हैं, "फिलहाल 20 से 30 फीसदी भारतीय इंजीनियर ग्राहक की लोकेशन से काम करते हैं. पहले एच-1बी वीजाधारक अमेरिका में आसानी से नौकरी बदल सकता था. लेकिन अब उनके लिए मुश्किलें पैदा हो जाएंगी."

बढ़ती प्रतीक्षा सूची

अमेरिकी वीजा के लिए आवेदन की खातिर हर साल अप्रैल-मई में आईटी कंपनियों के बीच लॉटरी होती है. उसके बाद अक्टूबर तक तमाम कर्मचारी अमेरिका का रुख करते हैं. वर्ष 2015 में वीजा के लिए भेजे 30 फीसदी आवेदन लॉटरी के जरिये मंजूर हुए थे. लेकिन कामकाज भारत शिफ्ट होने की वजह से ज्यादातर कंपनियां वीजा के बावजूद सभी कर्मचारियों को अमेरिका नहीं भेज पातीं. बीते साल आईबीएम के 20 फीसदी कर्मचारी वैध वीजा के बावजूद अमेरिका नहीं जा सके थे. अब इस साल नए सिरे से लॉटरी हो रही है.

ऐसे में अगर अमेरिकी संसद उक्त कानून पारित कर देती है तो हजारों की तादाद में ऐसे भारतीय इंजीनियर प्रतीक्षा सूची में होंगे जिनके पास वैध अमेरिकी वीजा के बावजूद वहां करने के लिए कोई काम नहीं होगा. इसका दूरगामी असर पड़ेगा. आईबीएम के एक अधिकारी बताते हैं कि वैसी स्थिति में बारी-बारी कर्मचारियों को अमेरिका भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा. तब पहले से वहां काम कर रहे लोगों को तय समय से पहले ही लौटने को कहा जा सकता है.

आईटी कंपनियों का कहना है कि प्रस्तावित विधेयक के पारित होने के बाद अमेरिका में भारतीय आईटी पेशेवरों के जाने पर कई किस्म की पाबंदियां लग जाएंगी. उद्योग की राय में वैसी स्थिति में अमेरिका से सटे कनाडा और मेक्सिको जैसे देशों में दफ्तर खोलने होंगे. समय में खास अंतर नहीं होने की वजह से वहां से अमेरिकी परियोजनाओं पर काम करना आसान होगा. फिलहाल उद्योग की निगाहें अमेरिकी संसद पर टिकी हैं. आखिर उसके फैसले पर ही सैकड़ों कंपनियों और हजारों आईटी पेशेवरों का भविष्य जो टिका है.

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