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खेल

मुक्केबाजी से कामयाब हरियाणा की लड़कियां

दसवीं पास सोनिया कटारिया 2015 की बॉक्सिंग जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप की सिल्वर मेडल विजेता हैं, तो साक्षी 64 किलोग्राम वर्ग में 2015 में बॉक्सिंग वर्ल्ड चैंपियन का खिताब जीत चुकी हैं,

16 साल की सविता ने भी 2015 में वर्ल्ड चैंपियनशिप का खिताब जीता है. अपने नाम कर गांव, राज्य और देश का नाम रोशन कर चुकी हैं. ये तीनों लड़कियां ऐसे राज्य से ताल्लुक रखती हैं जहां का लिंगानुपात 891 हैं और राज्य सरकार इसे 950 पार करने की कोशिश कर रही है. बात हरियाणा की हो रही है. भिवानी की एक आम सुबह और भिवानी बॉक्सिंग क्लब में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित कोच जगदीश सिंह की देखरेख में भविष्य के चैंपियन मुक्केबाज प्रैक्टिस कर रहे हैं. इस क्लब में लड़के और लड़कियां दोनों ही बॉक्सिंग सीखते हैं. कोई पंचिंग बैग पर मुक्के चला रहा है तो कोई उठक बैठक लगा रहा है तो कोई रेत पर नंगे पांव दौड़ रहा है.

बीबीसी यानी भिवानी बॉक्सिंग क्लब की एक खास बात यह भी है कि यहां लड़कियां भी बॉक्सिंग सीखने आती हैं. जब हमने इनसे बॉक्सिंग सीखने का मकसद पूछा तो वे कहती हैं कि मेडल जीत कर अच्छी नौकरी पाना आसान है और साथ ही वे अपने परिवार की आर्थिक मदद करने में भी सक्षम हो जाती हैं. बीबीसी में फिलहाल 35 लड़कियां ट्रेनिंग पा रही हैं. ज्यादातर हरियाणा की ही रहने वाली हैं. इस क्लब से करीब 250 लड़कियां ट्रेनिंग हासिल कर चुकी हैं जिनमें 40-45 सफल महिला बॉक्सर अच्छे पदों पर नौकरी कर रही हैं.

बॉक्सिंग का मतलब अच्छा भविष्य

भिवानी से करीब तीस किलोमीटर दूर से बॉक्सिंग सीखने आने वाली साक्षी पिछले 4 सालों से बॉक्सिंग सीख रही हैं. ताइवान में वर्ल्ड चैंपियनशिप जीतने वाली साक्षी कहती हैं, "जब से विजेंद्र सिंह ने बॉक्सिंग में मेडल जीता तब से मैं भी बॉक्सिंग सीखना चाहती थी. मैंने अपने भविष्य के बारे में सोचा और बॉक्सिंग सीखने लगी. मेरे मम्मी पापा भी चाहते थे कि मैं कोई खेल में हिस्सा लूं और उनका सहारा बनूं." साक्षी के पिता पेशे से किसान हैं और मां घर का काम संभालती हैं, साक्षी कहती हैं कि जब कभी ट्रेनिंग के लिए मुझे क्लब आना पड़ता है तो उसके पिता ही उसे छोड़ने आते हैं.

साक्षी कहती हैं कि वह स्कूल जाने के पहले घर पर ही प्रैक्टिस कर लेती हैं और शाम में क्लब जाती हैं. साक्षी का सपना है ओलंपिक में पदक जीतना और फिर अच्छी नौकरी कर अपने माता पिता का सहारा बनना. भिवानी बॉक्सिंग क्लब के बारे में वे कहती हैं, "क्लब में पदक विजेता खिलाड़ी की तस्वीरें उन्हें पदक की भूख पैदा करने में प्रेरित करती हैं." साक्षी फिलहाल 12वीं में पढ़ती हैं और कम उम्र में ही शोहरत कमा चुकी हैं.

16 वर्षीय सविता भी जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप 2015 का खिताब जीत चुकी हैं. साक्षी की ही तरह सविता का परिवार भी खेती से जुड़ा है. सविता कहती हैं कि पहले वह ऐसे ही दौड़ा करती थी लेकिन बाद में पिता ने बॉक्सिंग सीखने के लिए भिवानी बॉक्सिंग क्लब भेज दिया. सविता के दो छोटे भाई बहन हैं और वे स्कूल में पढ़ते हैं. वर्ल्ड चैंपियन बनने का अनुभव बताते हुए सविता कहती हैं, "जब मैंने मेडल नहीं जीता था तो लोग मुझ पर ध्यान नहीं देते थे, लेकिन जब से कामयाबी मिली है समाज में इज्जत बढ़ी है. मैं ओलंपिक मेडल जीतकर अपने मां पिता की इज्जत बढ़ाना चाहती हूं और मेरा सपना रेलवे में नौकरी करने का है."

लड़कियों के बारे में बदलता नजरिया

जूनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीतने वाली सोनिया बताती हैं कि उसके पापा चाहते थे कि वह बॉक्सिंग सीखे और परिवार की मदद करें. सोनिया पिछले 4-5 साल से बॉक्सिंग सीख रही है और वह दुनिया भर में भारत का नाम रोशन करना चाहती हैं. सोनिया का भी सपना है बॉक्सिंग के जरिए रोजगार पाना. सोनिया कहती हैं कि हरियाणा में अब पहले जैसे हालात नहीं हैं. वह बताती हैं कि लड़कियां भी उसी तरह से हर खेल, काम में हिस्सा ले रही हैं जैसे लड़के लेते आए हैं. वह बताती हैं कि हरियाणा में अब लड़कियां के प्रति समाज में सकारात्मक बदलाव आया है.

भारत में बॉक्सिंग को लोकप्रिय बनाने में भिवानी के क्लब ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है. द्रोणाचार्य अवॉर्डी कोच जगदीश सिंह अपने क्लब के बारे में बताते हैं, "क्लब में देश के कोने कोने से लड़के लड़कियां बॉक्सिंग सीखने आते हैं, लेकिन हरियाणा से यहां ज्यादा बच्चे दाखिला लेते हैं. इस क्लब के खिलाड़ियों ने देश के लिए 239 मेडल जीते हैं जिसमें एक ओलंपिक मेडल, 12 मेडल वर्ल्ड चैंपियनशिप में शामिल हैं. वहीं नेशनल लेवल पर इस क्लब के खिलाड़ियों ने 499 मेडल जीते हैं. हरियाणा में खेलों को लेकर जुनून है."

भिवानी बॉक्सिंग क्लब का माहौल ऐसा है कि यहां जो लड़के लड़कियां बॉक्सिंग सीखने आते हैं वह यहां के कठोर मौसम में और कठोर बन जाते हैं. यह क्लब राजस्थान की सीमा से सटा है और कोच का कहना है कि इस तरह का कठोर वातावरण खिलाड़ियों को सफल खिलाड़ी बनाता है. जगदीश सिंह के मुताबिक, "क्लब में कोई भी आता है तो वह जॉब सिक्योरिटी के लिए आता है और इस क्लब से सीखने के बाद 40 से 50 महिला बॉक्सर नौकरी कर रही हैं. हमारे क्लब से बॉक्सिंग सीख कर निकलने वाले लड़के लड़कियां रेलवे, वायुसेना, सेना में नौकरी कर रहे हैं और जब भी उन्हें मौका मिलता है तो क्लब के लिए आर्थिक मदद के साथ साथ कोचिंग के गुर भी देने आते हैं.”

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