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मनोरंजन

मीडिया से आलोचनात्मक ध्यान की अपेक्षा

सैयद हैदर रजा भारत के शीर्षस्थ चित्रकार हैं. उन्होंने बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप का गठन किया. इसके सदस्यों के चित्रों की प्रदर्शनी ने आधुनिक भारतीय कला में एक नए युग का सूत्रपात किया.

सैयद हैदर रजा का जन्म मध्य प्रदेश के मांडला जिले में हुआ और शुरुआती शिक्षा-दीक्षा वहीं सम्पन्न हुई. देश को आजादी मिलने के बाद भारतीय कला को यूरोपीय यथार्थवाद के शिकंजे से मुक्त करने और उसकी स्वतंत्र अस्मिता की खोज करने के लिए उन्होंने फ्रांसिस न्यूटन सूजा और के.एच. आरा के साथ मिलकर 1947 में बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप का गठन किया. अगले वर्ष ही इसके सदस्यों के चित्रों की प्रदर्शनी ने आधुनिक भारतीय कला में एक नए युग का सूत्रपात कर दिया. शुरुआती दौर में कठिन संघर्ष करने वाले रजा आज सफलतम चित्रकारों में गिने जाते हैं. रजा 1950 के दशक से फ्रांस में रहने के बाद कुछ वर्ष पहले ही भारत लौटे गए हैं. जून 2010 में जब क्रिस्टी ने उनकी पेंटिंग “सौराष्ट्र” को लगभग साढ़े सोलह करोड़ रुपये में नीलाम किया तो कलाजगत में सनसनी मच गई. रजा को 1981 में पद्मश्री और ललित कला अकादेमी की रत्नसदस्यता से अलंकृत किया गया, 2007 में उन्हें पद्मभूषण और फिर पिछले वर्ष 2013 में भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया. 22 फरवरी, 2014 को रजा अपनी 92वीं वर्षगांठ मनाएंगे. उनसे बातचीत के कुछ अंश:

पेंटिंग की ओर आपका रुझान किस उम्र में और कैसे शुरू हुआ? क्या आपने बाकायदा किसी स्कूल में दाखिला लेकर चित्रकला सीखी?

पेंटिंग की ओर रुझान तो स्कूल के दिनों में ही हुआ. हमारे स्कूल की एक हस्तलिखित पत्रिका “पुष्पांजलि” निकलती थी. मैंने उसका आवरण बनाया था. फिर हमारे कलाध्यापक दरयाव सिंह जी ने मेरे पिता से कहा कि इस लड़के में कला की प्रतिभा है, इसलिए बेहतर होगा कि इसे विधिवत कला का प्रशिक्षण लेने के लिए नागपुर भेज दिया जाए. सो, मैं नागपुर आर्ट स्कूल में दाखिल हो गया और उसके बाद मुंबई में, उसे तब बंबई कहा जाता था, कुलकर्णी साहब के यहां शिक्षा ली और बाद में जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट में. कलाकार बनना हो तो उसका हुनर, उसका कौशल सीखना जरूरी है.

भारत के आजाद होने के समय कलाजगत का क्या हाल था? नए पेंटरों के सामने किस किस्म की चुनौतियां और जोखिम थे? आपने उनका सामना कैसे किया?

आजादी के समय कलाओं की स्थिति कुछ विडंबनात्मक थी. आजादी मिलने के कारण मुक्ति और संभावना का, नए सपनों और आकांक्षाओं का अहसास गहरा और तेज था. दूसरी ओर बंटवारे का दर्द भी गहरा था. सबसे बड़ी चुनौती थी एक स्वतंत्र देश की अपनी कला उसकी अपनी शर्तों पर विकसित करने की, एक नया सौंदर्यशास्त्र गढ़ने की जो परंपरा का आदर करे और साथ ही आधुनिकता के लिए जगह बनाए. ऐसी नई कला के लिए कलाप्रेमी रसिक और संरक्षक मिलना आसान नहीं था. साधन और समर्थन दोनों ही कम थे. मैंने और कई मित्रों ने इन चुनौतियों का सामना हिम्मत और जिद के साथ किया, आर्थिक हालात की परवाह किए बगैर. हमारे चित्र बहुत कम दाम में और मुश्किल से बिक पाते थे. मैं जीविका के लिए एक प्रेस में काम करता था और (मकबूल फिदा) हुसैन सिनेमा के पोस्टर बनाते थे.

फ्रांस के साथ आपका संबंध कैसे जुड़ा? वहां रहने से आपकी रचना प्रक्रिया किस रूप में प्रभावित हुई और क्या पुरानी और समकालीन यूरोपीय कला का आपके भीतर के चित्रकार पर कोई असर हुआ? और, अगर हुआ तो किस तरह का?

हुआ यूं कि श्रीनगर में मेरी एक प्रदर्शनी देखने के बाद विख्यात फोटोग्राफर ओनेरी कार्ते-ब्रेसां ने मुझे सलाह दी कि मुझे चित्र की संरचना समझने के लिए फ्रेंच कलाकार सेजां का अध्ययन करना चाहिए. मैंने मुंबई लौटकर दो बरस फ्रेंच भाषा सीखी और मुझे फ्रेंच सरकार की ओर से दो वर्ष के लिए छात्रवृत्ति मिल गई. मैं 1950 में पेरिस पहुंचा और फिर 1959 में मेरा फ्रेंच चित्रकार जानीन मोंजिला से ब्याह हुआ और फिर मैं साठ साल वहीं रह गया.

फ्रेंच कला और कलाकारों से बहुत कुछ सीखने को है. मैंने कला का कौशल वहीं सीखा और साथ ही यह भी सीखा कि कौशल के साथ विचार और दृष्टि भी चाहिए. बरसों पेरिस स्कूल का कलाकार होने और माने जाने के बाद मुझे लगा कि मैं फ्रेंच कलाकार हो गया हूं. लेकिन मन में यह विचार भी आता था कि इसमें मैं और मेरा देश कहां हैं? अपनी और अपने देश की इस खोज ने मुझे कई भारतीय अभिप्रायों जैसे बिन्दु, प्रकृति, कुण्डलिनी, प्रकृति-पुरुष, पंचतत्व आदि का अपनी कला में अन्वेषण करने की ओर प्रवृत्त किया. मैं पहले लैंडस्केप चित्रित करता था, लेकिन अब कई दशकों से मुख्यतः “इनस्केप” यानि अंतर्लेखन कर रहा हूं. इससे यूरोपीय कला से अलग होने और अपनी राह खुद बनाने की प्रेरणा भी मिलती है.

आज भारत में कला किस मुकाम पर खड़ी है? क्या आप कला के प्रति मीडिया के रवैये से संतुष्ट हैं?

भारत की कला अपनी परिपक्वता, प्रश्नाकुलता, बहुलता और ऊर्जा में विश्व कला के समकक्ष हो चुकी है और उसे ऐसी व्यापक मान्यता मिल भी रही है. भारतीय मीडिया कला की मूल्यवत्ता से कम और कीमत से अधिक आक्रांत है. उसमें कला प्रदर्शनियों की अच्छी समीक्षा निकालना बंद-सा हो गया है जबकि पहले ऐसा व्यापक रूप से होता था. लेकिन नए समीक्षक और युवा इतिहासकार उभर रहे हैं, यह उत्साहजनक है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अच्छी कला की समझ और पैठ बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए. भारतीय कला मीडिया से अधिक आलोचनात्मक ध्यान की अपेक्षा करती है.

नए कलाकारों के लिए कोई संदेश?

इतना ही कि कला का मार्ग हमेशा कठिन और लंबा होता है. उस पर पूरी तैयारी और जतन के साथ, अपने को खुला और संवेदनशील रखकर चलने की हिम्मत कभी कम नहीं होनी चाहिए. फैशन से बचना चाहिए. दृष्टि और कौशल कोई और आपको नहीं दे सकता. वे तो आपको स्वयं ही अर्जित करने और बढ़ाने होंगे.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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