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दुनिया

मीडिया में विदेशियों के प्रति पूर्वाग्रह

अमेरिका में अश्वेत किशोर माइकल ब्राउन की मौत के बाद मीडिया में नस्लवाद पर बहस शुरू हो गई है. जर्मनी में भी अक्सर टेक्स्ट और तस्वीरों में अल्पसंख्यक समुदायों के प्रति पूर्वाग्रह देखे जा सकते हैं.

इस बहस की शुरुआत एफ्रोअमेरिकी टेलर एटकिन्स ने की. उन्होंने ट्विटर पर दो तस्वीरें एक साथ लगाई. एक फोटो में 17 साल के एटकिन्स काले टीशर्ट और सिर पर स्कार्फ पहने हैं और दूसरे में काला कोट पैंट पहने सैक्सोफोन हाथ में लिए हैं. हैशटैग इफ दे गन्ड मी डाउन के साथ उन्होंने पूछा कि मीडिया में आप इन दोनों में से कौन सा चित्र इस्तेमाल करेंगे. अधिकतर लोगों ने एक जैसे जवाब दिए. ये दिखाता है कि किस तरह पूर्वाग्रह पैदा होते हैं और उन्हें पक्का किया जाता है, मीडिया के जरिए. यह सिर्फ अमेरिका में नहीं होता, पूरी दुनिया में होता है.

जर्मन मीडिया में शरणार्थी

ताहिर डेला भी मीडिया से पैदा होने वाली इस ताकत को जानते हैं. वह "जर्मनी में अश्वेत" नाम से चलाए जा रहे एक अभियान का हिस्सा हैं. वह अखबारों, टीवी और इंटरनेट में नस्लवादी रुढ़ोक्तियों के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाने की कोशिश कर रहे हैं. वह आरोप लगाते हैं, "अश्वेतों को अक्सर ड्रग्स से जुड़े अपराधों, अवैध प्रवासियों से जोड़ा जाता है और इन्हें बार बार मीडिया में दिखाया जाता है." वह कहते हैं कि जितनी बार शरणार्थियों के बारे में कुछ लिखा जाता है, उतनी बार चित्र अफ्रीका के अश्वेत लोगों का ही लगाया जाता है. जबकि सबसे ज्यादा संख्या में शरणार्थी अफ्रीका से नहीं आते.

पत्रकार कोंस्टाटीना वासिलेउ एंस भी पूर्वाग्रह ग्रसित चित्रों और वाक्यों के प्रति जागरूक होने की सलाह देती हैं. वह कहती हैं, "अपराधों की रिपोर्टिंग में अगर दोषी जर्मन नहीं है तो अक्सर उसकी नागरिकता या मूल बताया जाता है. यानि अपराध करने का वाला कोलोन का कोई अहमद एच नहीं होगा बल्कि तुर्की मूल का अहमद एच बताया जाएगा." इससे तुर्क विशेषण एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता वह समुदाय की पहचान बन जाता है.

पेशेवर रवैये की जरूरत

अगर थोड़ा ध्यान दिया जाए इस तरह के कई विशेषणों से बचा जा सकता है. समाज में घुलने मिलने से जुड़े हर चित्र में बुर्का पहने या सिर ढंके हुए महिला दिखाई देगी. अगर इस तरह के किसी चित्र का इस्तेमाल करना ही है तो सब्जी से भरी थैलियां लेकर जाने वाली सिर से पैर तक ढंकी महिला का चित्र दिखाना जरूरी नहीं है. बल्कि सिर्फ सिर ढंकी हुई महिला भी दिखाई जा सकती है.

एक तरफा रिपोर्टें अक्सर रुमेनियाई और बुल्गेरियाई आप्रवासियों पर भी होती हैं, चाहे चित्र हो या सामान्य रिपोर्ट. इनके बारे जब भी तस्वीरें दिखाई जाती हैं, तो टूटे घर और खस्ताहाल रहन सहन की ही तस्वीरें होती हैं. कभी नहीं दिखाया जाता कि इन देशों से आया कोई व्यक्ति डॉक्टर के तौर पर भी काम कर रहा है. इन पूर्वाग्रहों से पार पाने का इकलौता तरीका पारदर्शी और सटीक शोध है. हर विषय और समुदाय पर व्यापक और गहन पेशेवराना अंदाज की जरूरत है.

रिपोर्टः गुंथर बिर्केनश्टॉक/एएम

संपादनः महेश झा

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