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दुनिया

मिस्र में राष्ट्रपति चुनाव

मिस्र में राष्ट्रपति चुनाव हो रहे हैं. सेना प्रमुख अब्दुल फतह अल सिसी देश के अगले राष्ट्रपति बन सकते हैं. क्रांति के बाद लोकतंत्र स्थापित होने के बावजूद मिस्र स्थिर नहीं है और लोग एक ताकतवर प्रतिनिधि चाहते हैं.

59 साल के अल सिसी के बारे में विश्लेषकों का मानना है कि वह बड़ी आसानी से अपने प्रतिद्वंद्वी वामपंथी हमदीन सब्बाही को हरा देंगे. चुनाव में अपना वोट डालने आए सिसी ने कहा, "पूरी दुनिया हमें देख रही है, किस तरह मिस्र की जनता अपना इतिहास और अपना आज और कल रच रही है. मिस्र की जनता को विश्वास दिलाना होगा कि कल बहुत ही सुंदर और महान होगा." अल सिसी के समर्थकों ने उनके गाल चूमे और उनसे हाथ मिलाया.

कई लोगों का मानना है कि यह चुनाव से ज्यादा स्थिरता पर जनमत संग्रह है. 2011 में अरब क्रांति और तानाशाह हुस्नी मुबारक के अपदस्थ होने के बाद 8.6 करो़ड़ लोगों के देश में तनाव और हिंसा का माहौल बना रहा है. मुबारक के बाद लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए सत्ता में आए मुस्लिम ब्रदरहुड के मुहम्मद मुर्सी अपने पद पर एक ही साल टिक पाए. अब ज्यादातर लोग स्थिरता चाहते हैं. 29 साल के मिलाद हन्ना ने कहा, "हमें एक ऐसा शख्स चाहिए जो दृढ़ होकर बोले. मिस्र के लोग ऐसे व्यक्ति से डरते हैं और उनका सम्मान करते हैं. हमें एक ताकतवर व्यक्ति चाहिए, मिलिट्री का आदमी." अल सिसी ने खुद कहा है कि मिस्र मे "असली लोकतंत्र" लाने मे कई दशक लगेंगे और वह खुद उन विरोधी प्रदर्शनों के खिलाफ होंगे, जिनसे अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा.

Fattah al-Sisi

पूर्व सेना प्रमुख फतह अल सिसी

पिछले साल जुलाई में अल सिसी और उनके सैनिकों ने मुहम्मद मुर्सी की सरकार को सत्ता से हटाया और देश पर कब्जा कर लिया. मुर्सी भी हिरासत में ले लिए गए. इसके बाद मिस्र में भारी हिंसा हुई जिसमें सैंकड़ों लोगों की जानें गईं. मुर्सी की पार्टी मुस्लिम ब्रदरहुड ने चुनाव के बहिष्कार का फैसला किया है और कहा है कि वह चुनावी नतीजों को मान्यता नहीं देगा. इनके अलावा देश में ऐसे कई युवा क्रांतिकारी गुट हैं जिनका मानना है कि अल सिसी के आने से मिस्र दोबारा एक तानाशाह के कब्जे में आ जाएगा. इन युवा गुटों ने भी चुनाव में हिस्सा नहीं लेने का निर्णय किया है. मुस्लिम ब्रदरहुड को प्रतिबंधित कर दिया गया है और पुलिस कार्रवाई में उसके हजार से ज्यादा समर्थक मारे गए हैं. पिछले साल अगस्त में करीब 700 समर्थन मारे गए. एक अदालत ने हाल ही में मुर्सी के 500 से ज्यादा समर्थकों को मौत की सजा सुनाई थी लेकिन बाद में केवल 37 मामलों में इस फैसले को बरकरार रखा गया.

अल सिसी के खिलाफ खड़े हो रहे हमदीन सबाही गमाल अब्देल नासेर की वामपंथी सोच वाले तबके के हैं और एक किसान के बेटे हैं. 1996 में सबाही ने वामपंथी करामा पार्टी का गठन किया और 2004 में किफाया यानी "बस बहुत हो गया" आंदोलन की शुरुआत की. आंदोलन के जरिए मुबारक शासन में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन हुए. माना जाता है कि किफाया आंदोलन ने काफी हद तक मिस्र में मुबारक को अपदस्थ करने की कोशिशों को प्रेरित किया.

एमजी/ओएसजे(एएफपी, रॉयटर्स)

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