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दुनिया

मिस्र की क्रांति का काला पन्ना

ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है, 91 महिलाएं मिस्र में चार दिन के विरोध प्रदर्शन में यौन दुर्व्यवहार का शिकार हुईं. कई औरतें चुप्पी तोड़ रही हैं लेकिन यह लंबी लड़ाई है.

शुक्रवार को मिस्र में हिंसा फिर फैल गई. पूरे देश में दर्जनों लोग मारे गए और एक हजार से ज्यादा घायल हुए. देश के भविष्य के नाम पर मुहम्मद मुर्सी के समर्थकों और विरोधियों में जंग छिड़ी है और जाहिर है कि दोनों तरफ से पुरुषों की संख्या ही ज्यादा है. 27 साल की निहाल साद जगलाऊ कहती हैं, "मेरा शरीर मेरा है. जितना ज्यादा हम महिलाओं के अधिकार के लिए लड़ते हैं, दुर्व्यवहार और बलात्कार करने वालों की तादाद उतनी बढ़ती जाती है." यही वजह है कि निहाल ने शुक्रवार की रात तहरीर स्क्वेयर न जाने का फैसला किया. वह कहती हैं, "यह खतरनाक है."

निहाल उस खतरे की चपेट में फिर नहीं आना चाहतीं जिसे "मिस्र की क्रांति का काला पक्ष" कहा जा रहा है. 2012 में तहरीर स्क्वेयर पर दोस्तों के साथ जाते वक्त उनके साथ भी दुर्व्यवहार हुआ. वह बहुत डरावना अनुभव था लेकिन उन्होंने इस लड़ाई में उतरने का फैसला किया. आईटी प्रोग्रामर जगलाऊ ने कुछ लोगों के साथ मिल कर "बसमा" नाम से एक संगठन बनाया है. बसमा का मतलब है चिह्न. यह संगठन जागरुकता फैलाने में जुटा है और इसका कहना है कि यौन दुर्व्यवहार मिस्र में लंबे समय से रोजमर्रा की बात बना हुआ है और इसे रोकना होगा.

प्रदर्शन में सामूहिक बलात्कार

मिस्र में प्रदर्शनों के दौरान क्रूर हमलों का शिकार हुई महिलाओं की संख्या बढ़ रही है. महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहा है और वो भी बहुत से पुरुषों की मौजूदगी में. कुछ पीड़ितों का कहना है कि उस दौरान 100 से ज्यादा पुरुष मौजूद थे. हमला कुछ मिनटों से लेकर कई घंटों तक का हो सकता है. ह्यूमन राइट्स वॉच ने एक वीडियो जारी किया है जिसमें हानिया मोहिब नाम की एक महिला ने बताया है कि कुछ महीने पहले तहरीर स्क्वेयर पर कैसे एक शांति प्रदर्शन उनके लिए बुरे सपने में बदल गया. हानिया कहती हैं, "उन लोगों ने मेरे चारों ओर एक सख्त घेरा बना लिया, और मेरे शरीर के हर हिस्से को हाथ लगाते रहे, मुझे बहुत ज्यादा चोट पहुंचाई गई, मैं पूरे वक्त केवल चीखती रही."

जब से विरोध शुरू हुए हैं तब से सैकड़ों महिलाओं के साथ इस तरह के जुल्म हुए हैं और इनमें मिस्रवासियों के साथ विदेशी महिलाएं भी शामिल हैं. सीबीएस की दक्षिण अफ्रीका संवाददाता लारा लोगान 2011 में इस मुद्दे को दुनिया तक पहुंचाने में जुटी थीं और तभी उनके साथ भी सामूहिक बलात्कार किया गया.

दोषियों पर जिम्मेदारी नहीं

नवंबर 2011 से ही पुलिस तहरीर चौक से गायब है ताकि विरोध प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों से झड़प न हो. यहां महिला प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा करने वाला कोई नहीं है. बलात्कार करने वाले पुरुष जानते हैं कि उन्हें कुछ नहीं होगा. ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि पुलिस इन मामलों में कुछ नहीं करती. दोषी अपने अनजान होने का फायदा उठा ले जाते हैं. कुछ संगठनों ने खुद अपनी पहल पर सुरक्षा की कोशिश की है. इनमें तहरीर बॉडीगार्ड और ऑपरेशन एंटी सेक्सुअल हैरसमेंट सबसे बड़े हैं. हालांकि कई बार बचाव की कोशिश करने वाले कार्यकर्ता भी हमलावरों के शिकार बनते हैं. निहाल साद ने डीडब्ल्यू से कहा, "यह बहुत ज्यादा परेशान और निराश करने वाला है."

ज्यादा ध्यान नहीं

समस्या बहुत पुरानी है और इसके तार होस्नी मुबारक के शासन के दौरान मिस्र में हुए दमन से जुड़े हैं. निहाल साद कहती हैं, "यह स्वाभाविक है कि जब पुरुषों का दमन होता है तो वो उनका दमन करते हैं जो उनसे कमजोर हैं और यहां उनके सामने महिलाएं हैं." मुर्सी और मुस्लिम ब्रदरहुड के शासन में भी बहुत कुछ नहीं बदला. शूरा काउंसिल के सलाफी सदस्य जनरल आदेल अफीफी ने फरवरी 2012 में उन महिला प्रदर्शनकारियों के संदर्भ में कहा जिनके साथ बलात्कार हुआ, "बलात्कार में महिलाओं की भी बड़ी भूमिका है क्योंकि वो खुद को उन परिस्थितियों में डालती हैं."

हालांकि निहाल केवल मुर्सी और इस्लामियों को महिलाओं के खिलाफ हिंसा के लिए जिम्मेदार नहीं मानती. उनका कहना है, "उन्होंने कई गलतियां की और वह महिलाओं के अधिकार पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे थे लेकिन उनके पहले की सरकारों ने भी महिलाओं के अधिकार के लिए कुछ नहीं किया." (महिला प्रदर्शनकारियों के कौमार्य की जांच)

संगठन अपनी तरफ से जागरुकता लाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन इसमें पुरुषों का शामिल होना भी जरूरी है और शायद तभी बात बन पाएगी. निहाल कहती हैं, "उनकी मां हैं, बहनें हैं और वे सचमुच मानते हैं कि महिलाएं भी इंसान हैं." बसमा में काम करने वाले ज्यादातर पुरुष हैं और इससे बदलाव आ रहा है. संगठन से जुड़े लोग मान रहे है कि क्रांति के साथ ही सीखने की एक प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है और महिलाओं के साथ ही पुरुष सीख रहे हैं लेकिन फिर भी बदलाव में वक्त लगता है.

रिपोर्टः नीना हासे/एनआर

संपादनः महेश झा

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