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मनोरंजन

मिजवां से करोड़ों दिलों तक पहुंचे कैफी आजमी

हिन्दी फिल्म जगत के मशहूर शायर और गीतकार कैफी आजमी 10 मई 2002 को दुनिया छोड़ गए. उनकी पुण्यतिथि के मौके पर डालते हैं उनके जीवन के सफर पर एक नजर, जिसमें वे खूब तपे और हीरा बन कर निकले.

आजमी की शेरोशायरी की प्रतिभा बचपन से ही दिखाई देने लगी थी. आजमी ने अपनी मां से कहा था, "अम्मा एक दिन मैं बहुत बड़ा शायर बनकर दिखाऊंगा." 14 जनवरी, 1919 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के मिजवां गांव मे जन्मे सैयद अतहर हुसैन रिजवी उर्फ 'कैफी आजमी' के पिता जमींदार थे. पिता उन्हें खूब ऊंची तालीम देना चाहते थे. इसके लिए आजमी को लखनऊ के प्रसिद्ध सेमिनरी, सुल्तान उल मदारिस भेजा गया. महज ग्यारह साल की उम्र से ही आजमी ने मुशायरों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया और खूब दाद भी बटोरी.

पूत के पांव पालने में

कई लोगों को शक था कि आजमी मुशायरों के दौरान खुद की नहीं, बल्कि अपने बड़े भाई की गजलें सुनाया करते हैं. एक बार उनकी परीक्षा लेने के लिए पिता ने उन्हें गाने की एक पंक्ति दी और उस पर उन्हें गजल लिखने को कहा. आजमी ने इस चुनौती को स्वीकार किया और गजल लिख डाली. उनकी यह गजल उन दिनों काफी लोकप्रिय हुई और बाद में सुप्रसिद्ध गायिका बेगम अख्तर ने उसे अपना स्वर दिया. उस गजल के बोल थे, "इतना तो जिंदगी में किसी की खलल पड़े, ना हंसने से हो सुकूं ना रोने से कल पड़े".

आजमी ने कभी उच्च शिक्षा की ख्वाहिश नहीं रखी. सेमिनरी में पढ़ाई के दौरान वहां की कुव्यवस्था को देखकर कैफी आजमी ने छात्र संघ का निर्माण किया और अपनी मांग पूरी नहीं होने पर छात्रों से हड़ताल पर जाने की अपील की. उनकी अपील पर छात्र हड़ताल पर चले गए. उनका धरना करीब डेढ़ साल तक चला. लेकिन इसी हड़ताल के कारण आजमी सेमिनरी प्रशासन के कोपभाजन बने. धरने की समाप्ति के बाद उन्हें सेमिनरी से निकाल दिया गया.

अन्याय के खिलाफ बुलंद आवाज

इस हड़ताल से कैफी आजमी को फायदा भी पहुंचा. उस समय के कुछ प्रगतिशील लेखकों की नजर उन पर पड़ी. आजमी के अंदर उन्हें एक उभरता हुआ कवि दिखाई दिया और उन्होंने उनको प्रोत्साहित करने की हर संभव सहायता देने की पेशकश की. इसके बाद एक छात्र नेता अतहर हुसैन के अंदर कवि कैफी आजमी ने जन्म ले लिया. साल 1942 में आजमी उर्दू और फारसी की उच्च शिक्षा के लिए लखनऊ और इलाहाबाद भेजे गए लेकिन कैफी ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की सदस्यता ग्रहण करके पार्टी कार्यकर्ता के रूप में काम करना शुरू कर दिया. बाद में भारत छोड़ो आंदोलन में भी शामिल हुए.

1947 में एक मुशायरे में शिरकत करने हैदराबाद पहुंचे आजमी की मुलाकात शौकत आजमी से हुई. जल्दी ही मुलाकात शादी मे तब्दील हो गयी. आजादी के बाद उनके पिता और भाई पाकिस्तान चले गए. लेकिन कैफी आजमी ने हिंदुस्तान में ही रहने का निर्णय लिया. शादी के बाद बढ़ते खर्चों को देखकर आजमी ने एक उर्दू अखबार के लिए लिखना शुरू कर दिया, जहां से उन्हें 150 रूपये माहवार वेतन मिला करता था. घर के बढ़ते खर्चों को देख कैफी आजमी ने फिल्मी गीत लिखने का निश्चय किया.

Shabana Azmi

बेटी शबाना आजमी हैं अभिनेत्री और सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता

किया फिल्मों को भी समृद्ध

कैफी आजमी ने सबसे पहले शाहिद लतीफ की फिल्म 'बुजदिल' के लिए दो गीत लिखे जिसके एवज में उन्हें 1000 रूपये मिले. इसके बाद 1959 में फिल्म 'कागज के फूल' के लिए कैफी आजमी ने 'वक्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे ना तुम हम रहे ना हम', जैसा सदाबहार गीत लिखा. 1965 में आई फिल्म 'हकीकत' में उनके रचित गीत "कर चले हम फिदा जानों तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों" की कामयाबी के बाद कैफी आजमी सफलता के शिखर पर जा पहुंचे.

बहुमुखी प्रतिभा के धनी कैफी आजमी ने फिल्म 'गर्म हवा' की कहानी, संवाद और स्क्रीन प्ले भी लिखे. इसके लिए उन्हें फिल्म फेयर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. फिल्म 'हीर रांझा' के डायलॉग के साथ साथ उन्होंने श्याम बेनेगल की फिल्म 'मंथन' की पटकथा भी लिखी. 75 साल की उम्र से उन्होंने अपने गांव मिजवां में ही रहने का निर्णय किया. यहीं उन्होंने अपनी आखिरी सांसें लीं.

आरआर/आईबी (वार्ता)