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ब्लॉग

मार्केस के जादू से बंधी दुनिया

20वीं सदी राजनीति से कला और साहित्य तक तूफानी सदी रही है. इसके प्रतिनिधि स्वरों में एक थे कोलंबियाई उपन्यासकार गाब्रिएल गार्सिया मार्केस. उनका जादू लातिन अमेरिका ही नहीं, पूरी दुनिया के लेखकों और पाठकों को खींचता रहा है.

मार्केस ने लेखन की तकनीकें काफ्का, मिखाइल बुल्गाकोफ, एर्नेस्ट हेमिंग्वे, वर्जीनिया वुल्फ और जेम्स जॉयस जैसे लेखकों से हासिल की थीं. दोस्तोएव्स्की, मार्क ट्वेन और एडगर एलन पो का असर भी उन पर रहा है. डॉन क्विजोट का आख्यान उनका एक सबक है. साइमन बोलीवर उनके कथानकों के महानायकों में दिखते रहते हैं. मार्केस के लेखन का सबसे बड़ा खजाना है उनकी स्मृतियां. बचपन की स्मृतियां, जहां उनका ननिहाल है, नाना-नानी हैं, मां है, मौसियां हैं, आयाएं और दाइयां हैं. एक पूरा कस्बा है. लोग हैं. दोस्त हैं. मार्केस ने मृत्यु के बारे में अपने भय को रेखांकित करते हुए कहा था कि मृत्यु का एक अर्थ ये भी होता है कि आप अपने दोस्तों से फिर नहीं मिल पाते हैं.

यथार्थ के पास

मार्केस एक बीते हुए जीवन को फिर से सृजित करने की जिद करते हुए लिखते हैं. और इसी में उनका जादू निहित है. इसलिए उनके लेखन के यथार्थ को जादुई यथार्थ कहा जाता है. उनके रियलिज्म की खूबी है उसकी सपाटता. उसके अनथक विवरण. एक दीर्घ ब्योरा. जैसे किसी घटना या व्यक्ति की रिपोर्टिंग. जैसे पत्रकारिता. लेकिन इसी सपाटता में मार्केस मानो छेनी हथौड़ी लेकर जगह जगह कुछ निशान उकेर देते हैं. अपने घर और पुरखों की स्मृति को लातिन अमेरिकी संघर्ष और तकलीफ भरे अतीत से जोड़कर मार्केस ने अपने साहित्य का रास्ता चुना जो उनकी रचनाओं की तरह ही अजीबोगरीब किस्सों, मान्यताओं, अंधविश्वासों और रोमानों से भरा है. ये रास्ता चमकीली सड़कों, भव्य पोशाकों, अप्रतिम सुंदरियों और आलीशान मकानों और होटलों वाले न्यूयार्क, पेरिस और मॉस्को तक जाता है. ये क्यूबा, कास्त्रो, क्लिंटन और मितरां तक भी जाता है और मार्केज को जानने के लिए हमें वो हर दरवाजा खटखटाना पड़ता है जिसके अंदर भूगोल, इतिहास, संस्कृति और स्मृति के रहस्यों की कभी न खत्म होने वाली लाखों करोड़ों वर्ष पुरानी सामग्री है.

मार्केस के यहां प्रेम न कर पाने की व्यथा प्रेम न पा सकने की छटपटाहट और प्रेम से दूर हो जाने की ग्लानि जिस प्रामाणिक और जीवंत तफ्सील के साथ आती है उससे पाठक भी वेदना, खुशी और रोमांच के मिलेजुले अनुभव से सिहरता जाता है. पाठकों पर उनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि उनकी किताबें बेस्टसेलर हो जाती हैं. 1965 में उन्होंने ‘वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉल्टियूड' लिखना शुरू किया था. 1967 में प्रकाशित हुआ ये उपन्यास बिक्री के मामले में किंवदंती ही बन चुका है.

मार्केस की छाया

लातिन अमेरिका की भू राजनैतिक और सांस्कृतिक बुनावट दक्षिण एशिया सरीखी है. जो जादू वहां से 20वीं सदी के 60 के दशक में चला वो बाद की पीढ़ी के भारतीय लेखकों पर भी गहरा प्रभाव छोड़ गया. हिन्दी में ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी मार्केस के जादुई यथार्थ की छायाएं चाहे अनचाहे प्रकट होने लगीं. भारतीय मूल के सलमान रुश्दी का उपन्यास "मिडनाइट चिल्ड्रेन" मार्केस की शैली में नये आयाम जोड़ता है. हिन्दी में उदय प्रकाश और उनके बाद की पीढ़ी से योगेंद्र आहूजा, अनिल यादव, चंदन पांडेय और राजकुमार राकेश जैसे कहानीकार मार्केस की लेखकीय बुनावट से प्रभावित दिखते हैं. अरुंधति रॉय के उपन्यास "गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स" में भी हम यथार्थ की विभिन्न अनुभूतियों से टकराते हैं. कन्नड़ लेखक यूआर अनंतमूर्ति का प्रसिद्ध उपन्यास "संस्कार" जिन बेचैनियों और उत्ताप का वर्णन करता है वो हमें मार्केस" में मिलती रही है.

मलयालम में तो लेखन के अलावा सिनेमा भी मार्केस से खासा प्रभावित रहा है. जाने माने फिल्मकार शाजी एन करुण तो मार्केस के दीवाने रहे हैं. अपार लोकप्रियता के बावजूद मार्केस की भारतीय भाषाओं में अनूदित अकेली रचना "वन हंड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड" है. ये उपन्यास हिन्दी, पंजाबी, मराठी, मलयालम, तमिल और बांग्ला में आ गया है. अन्य रचनाओं के अनुवाद आना बाकी हैं. कुछेक काम बेशक हिन्दी में है जिनमें ब्लॉग लेखक के अनुवाद भी शामिल हैं. इस मामले में देश के साहित्य प्रतिष्ठानों की उदासीनता भी कोई छिपी हुई बात नहीं है.

कहां जाएगा रास्ता

लेखन ही नहीं, मार्केस पत्रकारिता के भी उस्ताद थे. उनकी कई कहानियां और कुछ उपन्यास तो सीधे सीधे पत्रकारीय अनुभवों से निकले हैं. मार्केस की कहानियों के शीर्षक अखबारी सुर्खियां बनती रही हैं. "क्रॉनिकल ऑफ अ डेथ फोरटोल्ड" हो या "लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा" सबने अपने अपने अंदाज में अखबारी लेखन के लिए मार्केस के शीर्षक और उद्गार उधार लिए हैं. वो वास्तविक अर्थों में ग्लोबल लेखक थे. उनका लेखन इसलिए विश्वव्यापी प्रभाव छोड़ पाया क्योंकि उसमें सघन स्थानिकता थी और उसमें परंपराओं और मान्यताओं, स्त्रियों और उनके संघर्षों और दयनीयताओं, सबकी आवाजाही थी.

प्रेम, स्वप्न और स्मृति की ऐसी बारीक छानबीन मार्केस ने शुरू की थी कि आज भी उससे आगे का रास्ता नहीं सूझता. जब जब जादुई यथार्थ की बात होगी तो पहला नाम मार्केस का ही आएगा. वो यथार्थ जो हमारी अपनी जिंदगियों में भी कितना धंसा हुआ और फैला हुआ है.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

संपादनः अनवर जे अशरफ