1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ब्लॉग

माफ करें, माफी नहीं मांगूंगा

94 साल के लंबे इंतजार के बाद एक चुप्पी टूटी. अमृतसर पहुंचे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने 1919 के जलियांवाला बाग नरसंहार को शर्मनाक बताया, अफसोस जताया, लेकिन माफी मांगने का साहस कैमरन भी न जुटा सके. आखिर क्यों?

माफी मांगना या कसम खाना, ये अलग अलग शब्द हैं. लेकिन बहुत गहराई में इनके पीछे एक साझा भावना भी है. कसम की तरह माफी भी यह संदेश देती है कि भविष्य में ऐसा कृत्य दोबारा नहीं होगा. यह एक किस्म का वचन बन जाती है.

लोकतंत्र और मानवाधिकारों की बात करने वाले ब्रिटिश प्रधानमंत्री जलियांवाला बाग कांड के लिए माफी मांग कर एक स्वस्थ उदाहरण पेश कर सकते थे. कैमरन वह मौका चूक गए.

हालांकि नेता मौकों पर चूकते हैं या जानबूझकर उन्हें गंवाते हैं, यह बहस का विषय है.

आज जलियांवाला बाग के लिए माफी मांगी तो कल इराक युद्ध के लिए क्षमा मांगनी पड़ेगी. परसों अर्जेंटीना भी और असरदार ढंग से ब्रिटेन से मांग करेगा कि वो फॉकलैंड द्वीपों से अपना अधिकार छोड़े और माफी भी मांगे. दबाव बाकी देशों पर भी पड़ेगा. नोबेल शांति पुरस्कार विजेता बराक ओबामा से जापान पर किए दो परमाणु हमलों के लिए माफी मांगने की उम्मीद की जाने लगेगी.

भारत में सभी राजनीतिक पार्टियों के कुछ नेताओं से माफी मांगने की उम्मीद की जाने लगेगी. इसके लपेटे में नरेंद्र मोदी भी आएंगे और सिख विरोधी दंगों के जिम्मेदार कांग्रेसी नेता भी. अगर वाकई में ऐसा हो गया तो समाजिक चेतना और मानवीय मूल्य एक सीढ़ी ऊपर चले जाएंगे. माफी नैतिक मूल्यों की रक्षा करने वाली मजबूत दीवार बन जाएगी. क्या मौजूदा लोकतंत्र इसे पचा सकेगा.

इतिहास में गिने चुने ऐसे मौके हैं जब किसी देश या इक्का दुक्का राजाओं ने अपने किए के लिए माफी मांगी है. जर्मन नेता आज भी हिटलर और नाजियों की हरकतों के लिए माफी मांगते हैं. हालांकि नव नाजीवाद अब भी देश को परेशान कर रहा है, कुछ तत्व राष्ट्रवाद भड़काना चाहते हैं, लेकिन समाज का बड़ा हिस्सा आज भी बार बार मांगी गई माफी के नैतिक मूल्य को निभा रहा है.

ऐसा दूसरे मामलों में और बाकी देशों क्यों नहीं हो सकता, चुप्पी की वजह क्या है. दरअसल डर विनम्रता से माफी मांगने में नहीं बल्कि उसके बाद खड़ी होने वाली नैतिकता की उम्मीदों से है. अपने आप से है. कहीं न कहीं ऐसा लगता है कि माफी मांगने के दौरान दिया जाने वाला अनकहा वादा हम निभा पाएंगे या नहीं.

ब्लॉगः ओंकार सिंह जनौटी

(यह लेखक के निजी विचार हैं. डॉयचे वेले इनकी जिम्मेदारी नहीं लेता.)

DW.COM

WWW-Links