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दुनिया

माफी में देरी से नहीं घटेगी सजा

देविंदर पाल सिंह भुल्लर को मौत की सजा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ कर दिया है कि माफी की अपील पर देरी से फैसला आने के कारण उसकी फांसी को उम्रकैद में बदला नहीं जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद देश में कई और फांसियों पर अमल का रास्ता साफ हो जाएगा. 1993 में दिल्ली में एक कार बम धमाके के दोषी भुल्लर को 2001 में फांसी की सजा मिली थी. इस धमाके में 9 लोग मारे गए थे. भुल्लर के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दलील दी कि 2003 में उसने माफी की अपील की थी जिसे राष्ट्रपति ने 2011 में खारिज कर दिया. माफी के फैसले पर इस देरी पर भुल्लर की तरफ से कहा गया कि उसे इतने सालों की कैद का हर्जाना मिलना चाहिए. इसी आधार पर वकीलों ने मांग की कि उसकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया जाए.

सजा या मौत

भुल्लर की बीवी नवनीत कौर कोर्ट में मौजूद थीं. उन्होंने फैसले पर निराशा जताई. भारत के एक प्रमुख समाचार चैनल से बातचीत में नवनीत ने कहा, "हमने बहुत इंतजार किया, हमें काफी दिक्कतें हुईं, अदालत ने हमारी बात नहीं समझी, हमारे लिए यह उचित नहीं हुआ." देश की ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों ने इस फैसले का स्वागत किया है. सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी ने कहा है, "पूरा देश इस फैसले को स्वीकार करेगा." देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी बीजेपी ने इसे एक न्यायपूर्ण फैसला कहा.

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दिल्ली के एक मानवाधिकार संगठन एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स ने कहा है कि इस फैसले से देश में फांसी की सजा बढ़ जाएगी. संगठन से जुड़े सुहास चकमा ने कहा, "भारत को अब फांसी देना फिर शुरू करना होगा, उन 17 दोषियों को भी फांसी होगी जिन्होंने देरी को आधार बना कर कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है. भारत को यह तय करना चाहिए कि क्या वह चीन, ईरान, सउदी अरब और इराक के बाद सबसे ज्यादा फांसी देने वाले पांचवां देश बनना चाहता है."

वकीलों की दलील थी कि माफी के फैसले पर देरी से संविधान की अनुच्छेद 21 के तहत देश के नागरिकों को मिले जीवन के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन होता है. सुप्रीम कोर्ट के जज भुल्लर की इस दलील से सहमत नहीं हुए. जस्टिस जीएस सिंघवी ने फैसला सुनाते हुए कहा, "याचिकाकर्ता इसे सजा कम कराने का मामला बना पाने में नाकाम रहा है." कोर्ट के इस फैसले ने भुल्लर के पास फांसी से बचने के आखिरी रास्ते को भी बंद कर दिया और अब उसकी फांसी तय है. इतना ही नहीं यह मामला इसी तरह के 16 दूसरे मामलों के लिए भी नजीर बनेगा जिनमें सजा पर अमल अभी लंबित पड़ा है. इन मामलों में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के तीन हत्यारे भी शामिल हैं.

भारत में फांसी की सजा बहुत कम ही होती है. कोर्ट जिन मामलों को दुर्लभ से दुर्लभतम मानता है उनमें ही फांसी की सजा दी जाती है और उनमें भी ज्यादातर मामलों में ऊंची अदालतें फांसी को उम्र कैद में बदल देती हैं. फिलहाल 500 लोग यह सजा भुगतने की कतार में हैं. पिछले साल जुलाई में पद संभालने के बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बड़ी तेजी से माफी की अपीलों को खारिज किया है. आठ सालों से देश में किसी को फांसी नहीं हुई थी, लेकिन पिछले साल नवंबर में 2008 के हमलों में जिंदा पकड़े गए अकेले हमलावर अजमल कसाब को फांसी दी गई. इस साल फरवरी में कश्मीरी आतंकवादी अफजल गुरू को फांसी दे दी गई. अफजल गुरू को 2001 में संसद पर हुए आतंकी हमलों में उसकी भूमिका के लिए फांसी की सजा सुनाई गई थी. प्रणब से पहले के तीन राष्ट्रपतियों ने माफी की अपीलों पर फैसला काफी दिनों तक लंबित रखा.

एनआर/एमजे (डीपीए,एएफपी)

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