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दुनिया

मानसिकता में बदलाव से ही सुधरेगी स्थिति

महिला सशक्तिकरण और बराबरी के तमाम दावों के बावजूद आजादी के लगभग सात दशकों बाद भी समाज में महिलाओं की हालत में कोई खास सुधार नहीं आया है. समाज के नजरिए में भी महिलाओं के प्रति अब तक खास बदलाव देखने को नहीं मिला है.

राजस्थान के एक गांव में शादी के आठ साल बाद अपने मायके लौटी एक युवती को घरवालों ने जिंदा ही जला दिया. उसका कसूर यह था कि उसने अपने प्रेमी के साथ घर से भाग कर शादी कर ली थी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ठीक ऐसी ही एक घटना में घरवालों ने युवती और उसके प्रेमी दोनों की हत्या कर दी. हाल में घटी इन दोनों घटनाओं से साफ है कि महिला सशक्तिकरण और बराबरी के तमाम दावों के बावजूद आजादी के लगभग सात दशकों बाद भी समाज में महिलाओं की हालत में कोई खास सुधार नहीं आया है. देश के विभिन्न राज्यों से लगभग रोजाना ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं.

यह सही है कि पहले के मुकाबले युवतियों में शिक्षा का चलन बढ़ा है. बावजूद इसके जब समाज में बराबरी या पारिवारिक फैसलों की बात आती है तो उनकी राय को कोई अहमियत नहीं दी जाती. हर क्षेत्र में बढ़ती प्रतिद्वंद्विता और शादी-ब्याह में अशिक्षा के कारण होने वाली दिक्कतों के चलते अब ग्रामीण इलाकों में भी लोग अपनी बेटियों को स्कूल-कालेज भेजने लगे हैं.

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दोहरा बोझ

लेकिन समाज के नजरिए में महिलाओं के प्रति अब तक खास बदलाव देखने को नहीं मिला है. पश्चिम बंगाल, बिहार, राजस्थान और मध्यप्रदेश व झारखंड के आदिवासी इलाकों में बाल विवाह अब भी आम हैं. झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी राज्यों में अब भी बंधुआ मजदूरों के तौर पर महिलाओं के खटने की खबरें अक्सर सुर्खियां बनती हैं.

नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन कहते हैं, "मोटे अनुमान के मुताबिक पूरी दुनिया में हर साल लाखों महिलाएं लापता हो जाती हैं. अकेले भारत में यह तादाद रोजाना औसतन चार सौ है." सेन का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं की शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अब भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. सरकार के तमाम दावों के बावजूद बंगाल के ग्रामीण इलाकों में भी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं के बराबर हैं.

कहने को तो तमाम इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खुले हैं. लेकिन वहां न तो डाक्टर हैं और न ही जीवनरक्षक दवाएं. अर्थशास्त्री सिवन एंडरसन और देवराज रे के ताजा शोध के मुताबिक, देश में हर साल औसतन 20 लाख महिलाएं लापता हो जाती हैं. इसके अलावा कोई एक लाख महिलाओं की मौत आग से जलने की वजह से होती है. शोधकर्ताओं का दावा है कि इनमें से ज्यादातर मौतें दहेज के चलते होती हैं. साथ ही दिल के दौरे से मरने वाली महिलाओं की तादाद भी अच्छी-खासी है.

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रंग की अहमियत

समाजशास्त्रियों का कहना है कि प्रगति व बराबरी के तमाम सरकारी दावों के बावजूद जीवन में हर कदम पर महिलाओं को उपेक्षा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है. घर-परिवार की चक्की में पिसने की वजह से वे अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे पातीं. घरवाले भी उनकी छोटी-मोटी बीमारियों को नजरअंदाज कर देते हैं. हालत गंभीर होने की स्थिति में ही उनको अस्पताल ले जाया जाता है. पर्यवेक्षकों का कहना है कि महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए सदियों से जड़ें जमाए बैठी मान्यताओं में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है. देश के कई इलाकों में पितृसत्तात्मक समाज होने की वजह से महिलाएं अपनी उच्च-शिक्षा और बेहतर नौकरी के बावजूद उपेक्षा की शिकार रहती हैं.

समाजशास्त्री देवेंद्र कुमार कहते हैं, "महिलाओं के प्रति सरकार व राजनीतिक दलों की कथनी-करनी में भारी अंतर है. यही वजह है कि जब उनको 33 फीसदी आरक्षण देने की बात आती है तो तमाम दल बगलें झांकने लगते हैं." वह कहते हैं कि आम परिवार में भी कमाऊ पत्नी के वेतन से तो प्यार होता है लेकिन किसी अहम फैसले में उसे भागीदार बनाने में पुरुषों का अहम आड़े आ जाता है." देश में बढ़ते एकल परिवारों के बावजूद महिलाओं की स्थिति बेहतर नहीं हुई है. ऐसे में यह आश्चर्य नहीं है कि देश में हर साल महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं.

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अमानवीय अत्याचार

विश्व बैंक की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं में बढ़ती शिक्षा के बावजूद देश में आर्थिक मोर्चे पर उनकी भागीदारी में गिरावट आई है. इसकी वजह यह है कि ज्यादातर परिवारों में अब भी महिलाओं को घर से दूर रह कर नौकरी करने की इजाजत नहीं है. घर-परिवार व पति से दूर रह कर नौकरी करने वाली महिलाओं को समाज में अच्छी निगाहों से नहीं देखा जाता. उन पर घर के पास ही नौकरी करने का दबाव होता है. नतीजतन मजबूरी में कई बार उनको अच्छी नौकरी भी छोड़नी पड़ती है. रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न, हिंसा और घर से दफ्तर आने-जाने के दौरान होने वाली छेड़छाड़ को प्रमुख वजह माना गया है.

समाजशास्त्रियों की राय में महिलाओं की स्थिति में सुधार और समाज में उनको सम्मानजनक जगह दिलाने की दिशा में अब भी बहुत कुछ किया जाना है. इसके लिए पुरुष-प्रधान समाज की मानसिकता में बदलाव पहली शर्त है. लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या देश का पितृसत्तात्मक समाज अपना यह वर्चस्व छोड़ने के लिए आसानी से तैयार होगा? इस सवाल का जवाब नहीं मिलने तक समाज में महिलाएं उपेक्षा की ही शिकार रहेंगी. साल-दर-साल महिला दिवस की औपचारिकता से उनका कोई भला नहीं होगा.

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