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दुनिया

माओ की जयंती और साम्यवादी चीन

माओ झे डोंग को चीन की क्रांति, क्रांतिकारी नवीकरण और राष्ट्रीय मुक्ति के साथ विफल सांस्कृतिक क्रांति में लाखों लोगों को दी गई यातना के लिए भी जाना जाता है. लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी का काम आज भी उनके बिना नहीं चल रहा है.

दरअसल चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के पहले अध्यक्ष की 120 वीं जयंती पर विनम्रता का आह्वान किया था, लेकिन माओ के शहर शाओशान में इसकी अनसुनी कर दी गई. स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार माओ के जन्म दिन समारोह से जुड़ी कई परियोजनाओं पर दो अरब यूरो से ज्यादा खर्च किए जाने की योजना है. इसमें एक पर्यटन केंद्र और माओ के पुश्तैनी मकान की मरम्मत के अलावा हाईवे और रेल स्टेशनों का निर्माण भी शामिल है. माओ का हूनान प्रांत माओ की प्रसिद्धि से होने वाले कारोबार को सुरक्षित करना चाहता है.

चप्पे चप्पे में उपस्थिति

टैक्सियों में माओ की मूर्ति वाली रिंग लटका दिखती है और दीवारों पर कैलेंडर. सांस्कृतिक क्रांति के दिनों की माओ की तस्वीरें एंटीक की तरह सैकड़ों युआन में बिकती हैं. बीजिंग के प्रसिद्ध सिल्क बाजार में पर्यटक माओ की बाइबल समझी जाने वाली लाल किताब खरीद सकते हैं. चीन की मुद्रा पर आज भी माओ की तस्वीर उसी तरह दिखती है जैसे भारतीय रुपये पर महात्मा गांधी की. राजधानी बीजिंग में तियानमेन चौराहे पर माओ की 12 वर्मीटर की तस्वीर टंगी है और वहीं उनका स्मारक भी है जहां उनके शव को शीशे के ताबूत में सुरक्षित रखा गया है.

चीन में एक कहावत बहुत लोकप्रिय है. एक दिन माओ अपने ताबूत में उठ खड़े होते हैं और पूछते हैं कि चीन की जनता क्या कर रही है. स्मारक का पहरेदार बताता है, "चीनी जनता बड़े जमीनदारों के खिलाफ लड़ रही है." आश्वस्त होकर माओ फिर से अपनी ताबूत में लेट जाते हैं. ऐतिहासिक रूप से जमीनदारों के खिलाफ संघर्ष चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का सबसे महत्वपूर्ण आंदोलन था. इतिहासकार ऑस्कर वेगेल के अनुसार किसानों की दयनीय हालत और सामंतवाद से उनकी मुक्ति के बावजूद भूसुधारों के जमाने में नकली मुकदमे और व्यापक हत्यायें कम्युनिस्ट पार्टी के काले अध्यायों में शामिल है.

सत्तर-तीस का आंकड़ा

लेकिन काले अध्यायों का यहां अंत नहीं हुआ. माओ ने ऐसे आंदोलन छेड़े जिसमें करोड़ों चीनियों की जान गई. साम्यवादी चीन की स्थापना के दस साल बाद "ऊंची छलांग" लगाकर चीन का औद्योगीकरण करने की माओ की कोशिश इतिहास की सबसे बड़ी भुखमरी के हादसे के रूप में सामने आई. अनुमानों के अनुसार करीब 3 करोड़ लोग मारे गए. 1966 में माओ ने पार्टी के अंदर अपने विरोधियों को रास्ते से हटाने के लिए सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत की. नतीजा एक दशक की अव्यवस्था, हजारों लोगों की मौत और परिवारों के नुकसान रहा.

फिर भी पार्टी और सरकार के नेता माओ को आदर्श मानते हैं. चीन पर हमला करने वाले जापान के खिलाफ जीत में माओ की अभूतपूर्व भूमिका और देश के अंदर कोमिंतांग पर जीत ने माओ को 1976 में उनकी मौत तक पार्टी का एकछत्र नेता बना दिया. उनके बाद नेता बने डेंग शियाओ पिंग का यह कहना कि माओ की "70 फीसदी कार्रवाईयां सही और 30 फीसदी गलत" थीं, आज भी कम्युनिस्ट पार्टी की लाइन है.

जिनपिंग और नया माओ पंथ

कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व की नई पांचवीं पीढ़ी ने ऐसे कोई संकेत नहीं दिए हैं कि वह अपने माओ कालीन इतिहास पर चर्चा करना चाहती है. इतिहासकार झांग लीफान कहते हैं, "माओ का नया मूल्यांकन पार्टी की वैधता और उसके साथ उसकी सत्ता को हिला देगा." इसके विपरीत माओ का एक नया चलन देखा जा रहा है. जर्मन प्रोफेसर डानिएल लीज का कहना है कि वे चीन में घट रही घटनाओं पर हैरान हैं. पार्टी प्रमुख शी जिनपिंग को टेलीविजन में पार्टी सदस्यों के साथ आत्मालोचना बैठकों में भाग लेते दिखाया जा रहा है, "यह माओवादी तरीकों का इस्तेमाल है."

बर्लिन के चीन विशेषज्ञ सेबाश्टियान हाइलमन भी माओवादी सोच की ओर आकर्षण देख रहे हैं. वे कहते हैं, "राजनीतिक नेतृत्व समाज के वामपंथी तबके का समर्थन चाहता है. आर्थिक प्रगति कर रहे गुआंगडोंग प्रांत में भी 38 फीसदी लोग वामपंथी झुकाव रखते हैं." लोगों में माओवादी रुझान देखा जा सकता है. मुद्दा सामाजिक न्याय का है और यह ऐसी ताकत है जिसे चीनी नेतृत्व नजरअंदाज नहीं कर सकता.

यह मुद्दा उन कलाकारों के दिमाग में था, जिन्होंने माओ के जन्म दिन पर गहनों से लकदक सोने की मूर्ति बनाई है, इसमें संदेह है. लेकिन यह बात तय है कि माओ का चीन वयस्क पूंजीवादी काल पैर रख चुका है.

रिपोर्ट:यींग यांग/एमजे

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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